लखनऊ में करीब चार साल पहले दरिंदगी की शिकार हुई एक मासूम की कहानी सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। गुनहगार को अब जाकर सजा मिली है।
लखनऊ के काकोरी में करीब चार साल पहले एक दृष्टिहीन छात्रा (15 वर्ष) को कई दिनों तक अपनी हवस का शिकार बनाने वाले दरिंदे को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दस साल की कड़ी कैद और 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील दुर्गेश नंदिनी और पुष्पेंद्र गौतम ने आरोपी विश्राम लाल के खिलाफ ठोस साक्ष्य व गवाह पेश किए।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश राजेंद्र सिंह ने शनिवार को विश्राम को दोषी करार देकर सजा सुनाई। साथ ही जुर्माने की रकम का दो तिहाई पीड़िता को देने का आदेश दिया है।
पीड़िता काकोरी के राजकीय दृष्टिबाधित स्कूल में पढ़ती थी। विश्राम की पत्नी मंजू उस विद्यालय में आया थी। इस कारण विश्राम का वहां अक्सर आना-जाना था।
एक दिन विश्राम ने नेत्रहीन छात्रा को धमकाकर उसे अपनी हवस का शिकार बनाया। इसके बाद वह आए दिन दरिंदगी करने लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि छात्रा गर्भवती हो गई।
...और ऐसे हुआ प्रेग्नेंसी का खुलासा
गर्भवती होने की बात तब सामने आई जब वह दशहरे की छुट्टियों में लखीमपुर स्थित अपने गांव गयी।
15 अक्तूबर 2010 को वह अपने गांव पहुंची।
अचानक एक दिन उसके पेट में दर्द होने पर घरवालों ने उसे डॉक्टर को दिखाया। जांच के बाद उसके गर्भवती होने का सच सामने आया।
छात्रा धमकियों से बुरी तरह सहमी हुई थी। परिवारीजनों की कोशिशों के बाद आखिरकार छात्रा ने अपने साथ हुई दरिदंगी की दास्तां अपने माता-पिता को सुनाई थी।
घरवालों ने इसकी शिकायत जब स्कूल प्रबंधन से की तो उसे स्कूल से ही निकाल दिया गया। आखिरकार उसके पिता ने लखीमपुर के नीमगांव थाने में तहरीर दी।
यहां रिपोर्ट दर्ज होने के बाद जांच काकोरी पुलिस को सौंपी गई। काकोरी पुलिस ने 26 नवंबर 2010 को मामला दर्ज किया और इसके बाद मामले की तहकीकात शुरू की गई।
आरोपी को बचाने में जुटा था स्कूल प्रबंधन
लखीमपुर निवासी नेत्रहीन लड़की को काकोरी के राजकीय दृष्टिबाधित स्कूल में दाखिला कराया गया। पढ़ने में अच्छी होने के कारण वह छह माह में कक्षा दो व फिर तीन में पहुंच गई।
अन्य बच्चों के साथ वह यहीं छात्रावास में रहती थी। विश्राम उसे घुमाने के बहाने स्कूल ले जाता था और सुनसान स्थान पर दरिंदगी करता था।
बेटी से सच जानकर घरवालों ने स्कूल प्रबंधन से मामले की शिकायत की। परिवारीजनों ने मंजू व विश्राम का सच बताया। सच पता चलने पर भी प्रबंधन ने आया और उसके पति का ही पक्ष लिया।
उनपर कार्रवाई करने के बजाय छात्रा को ही स्कूल से निकाल दिया गया। मामला तूल पकड़ते देख स्कूल प्रबंधन ने उसे दबाने के हर प्रयास किए थे।
छात्रा को गर्भपात या ऑपरेशन के लिए स्कूल की गाड़ी से एक नर्सिंग होम ले जाया गया था। चार माह का गर्भ होने की वजह से डॉक्टरों ने ऑपरेशन से इन्कार कर दिया था।
सरकारी अमला भी लगातार झूठ बोलता रहा
विकलांग कल्याण विभाग के तत्कालीन उपनिदेशक अखिलेंद्र कुमार ने बयान दिया था कि पूरे प्रकरण का स्कूल से लेना-देना नहीं है।
मेडिकल रिपोर्ट में छात्रा के गर्भ ठहरने की जो संभावित तिथि है उस दौरान स्कूल में छुट्टियां थीं और गांव के दो लोगों ने उसका यौनशोषण किया है।
नेत्रहीन छात्रा से दुष्कर्म की खबरें प्रमुखता से छपने पर तत्कालीन विकलांग कल्याण निदेशक अरविंद द्विवेदी, उपनिदेशक एके श्रीवास्तव की टीम ने छात्रा के गांव जाकर जांच की।
उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि स्कूल के हॉस्टल की केयरटेकर मंजू के पति विश्राम लाल ने छात्रा से दुष्कर्म किया था।