चर्चित पत्रकार, लेखक, कहानीकार और फिल्म कथाकार मनोहर श्याम जोशी का ही नहीं, उनके पिता राय साहब प्रेम वल्लभ जोशी का भी लखनऊ से रिश्ता रहा है। उनकी विशेषता यह थी कि जिस क्षेत्र में कदम रखा वहां उन्होंने अपना लोहा मनवाया। वह राजपूत चित्रकारी के विशेषज्ञ बन गए। यद्यपि जोशी के खानदान में गाने-बजाने की कोई परंपरा नहीं थी लेकिन उन्होंने संगीत के क्षेत्र में सबसे ज्यादा नाम कमाया। आश्चर्यजनक तो यह है कि उन्होंने कभी संगीत की विधिवत दीक्षा नहीं ली थी लेकिन उनकी गणना देश के शीर्षस्थ संगीत शास्त्रियों में होने लगी। भारतीय शिक्षा सेवा के सदस्य के नाते अजमेर में नियुक्त होने के कारण सारा राजस्थान, मध्य भारत और ग्वालियर उनके कार्यक्षेत्र में था। यहां के रजवाड़ों से उन्हें न सिर्फ चित्रकला के बेहतरीन नमूने मिले बल्कि संगीतज्ञों को भी करीब से जानने का मौका मिला। मनोहर श्याम जोशी ने पिता से जुड़े एक संस्मरण में लिखा है, ‘बात उस जमाने की है जब विष्णुनारायण भातखंडे भारतीय शास्त्रीय संगीत की पुरानी बंदिशों और स्वरलिपियों की खोजबीन कर रहे थे। उसी बीच उनकी मुलाकात पिताजी प्रेम वल्लभ जोशी से हुई। पिता जी संगीत प्रेमी तो थे ही। शिक्षा सेवा के सदस्य होने के नाते उनका तमाम राजघरानों से भी संबंध था। जहां उन्हें राज दरबारों के संगीतज्ञों को निकट से देखने और समझने का अवसर भी मिला। वह भातखंडे जी के सहयोगी बन गए। उन्होंने पुरानी बंदिशों की खोजबीन और उनकी स्वर लिपि लिखने में भातखंडे जी का बड़ा सहयोग किया। उसी सिलसिले में पिता जी का लखनऊ आना-जाना हुआ। उन्होंनेे जब खोजबीन शुरू की तो उन्हें यहां शास्त्रीय संगीत का अद्भुत खजाना मिलने लगा। इसी बीच, भातखंडे जी ने पिताजी से भारतीय संगीत के खजाने को सहेजकर सुरक्षित रखने और संरक्षित करने के लिए संगीत शिक्षण संस्थान की इच्छा जताई। पिताजी ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री से से संपर्क कर यहां ‘मौरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक’ की स्थापना में भातखंडे जी का सहयोग किया। यही कॉलेज आज भातखंडे संगीत सम विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध है।’