डीजीसीआई की अनुमति के बाद फेज-1 का क्लीनिकल ट्रायल शुरू करेगा सीडीआरआई
लखनऊ। केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) की 90 के दशक में बनाई गई गर्भनिरोधक दवा छाया और सहेली के नाम से 30 साल से अधिक समय तक महिलाओं की दोस्त बनी रही। अब इस दवा (ओर्मेलॉक्सिफेन) को और अधिक प्रभावी और कम नुकसान वाला बनाने पर सीडीआरआई काम कर रहा है। औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने इसके लिए गैर हार्मोनल और ओरल ली जाने वाली दवा लेवोर्मेलॉक्सिफेन के फेज-1 के क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी सीडीआरआई को दे दी है।
सीडीआरआई लेवोर्मेलॉक्सिफेन को सिप्ला के साथ संयुक्त रूप से विकसित करने पर काम कर रहा है। सीडीआरआई की निदेशक डॉ. राधा रंगराजन का कहना है कि नई दवा गर्भधारण से बचने के लिए टैबलेट लेने के समय महिलाओं पर कैमिकल के बोझ को कम करेगी। सहेली, छाया की तरह इसे भी टैबलेट के रूप में लिया जा सकेगा। वहीं यह गैर हार्मोनल गर्भनिरोधक के रूप में ही विकसित की जा रही है।
सीडीआरआई के वैज्ञानिकों के मुताबिक ऑर्मेलॉक्सिफेन दो प्रतिरूप डेक्स्ट्रो एवं लेवो का मिश्रण है। आसान शब्दों में कहा जाए तो समान रासायनिक संरचना वाले लेकिन मिरर इमेज (दर्पण छवि) युक्त त्रि-आयामी (थ्री-डाइमेंशनल) संरचनाओं वाले दो यौगिक। प्री-क्लिनिकल शोध में यह पाया गया कि ऑर्मेलॉक्सिफेन की असर इसके लेवो रूप से प्रेरित है, इसलिए, सीडीआरआई और सिप्ला ने गर्भनिरोधक उपयोग के लिए लेवोर्मेलॉक्सिफेन को अलग से विकसित करने के लिए एक समझौता किया। नई दवा से डेक्स्ट्रो-ओर्मेलोक्सीफेन के अनावश्यक उपयोग को कम किया जा सकेगा। इससे लागत और महिलाओं पर केमिकल का अतिरिक्त बोझ कम हो जाएगा।
बाजार में सहेली, सरकारी योजनाओं में छाया
ऑरमेलॉक्सिफेन को सीडीआरआई ने फार्मा कंपनियों की मदद से 90 के दशक में सहेली ब्रांड नाम से बाजार में उतारा था। इसकी सफलता के बाद इसे कुछ साल पहले भारत सरकार ने अपने परिवार नियोजन कार्यक्रम में छाया नाम से शामिल कर लिया। अब यह मुफ्त में सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध है।