चंद्रभानु के सामने चित हो गए कांग्रेसी धुरंधर
प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त न सिर्फ मदद करने के लिए बल्कि राजनीतिक कौशल के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने काकोरी केस में फंसे रामप्रसाद विस्मिल, अशफाक उल्ला सहित सभी क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ा बल्कि कई मौकों पर बतौर वकील अंग्रेजी हुकूमत में न्यायाधीशों पर भी सवाल उठाए। मुंहफट और बेधड़क गुप्त सुभाष चंद्र बोस के ज्यादा नजदीक थे। शायद यही वजह थी कि कांग्रेस में रहने और सक्रिय रूप से काम करने के बावजूद जवाहर लाल नेहरू तक उनके विरोधी हो गए थे। पर, गुप्त ही थे जो कांग्रेस में रहते हुए सार्वजनिक रूप से यह कहने की हिम्मत रखते थे, ‘पंडित नेहरू हमारे विरोधी खेमे के हैं।’ समाजवादी बौद्धिक सभा के अध्यक्ष दीपक मिश्र बताते हैं, ‘अक्तूबर 1960 में कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव हो रहे थे। गुप्त भी प्रदेश अध्यक्ष के लिए खड़े हो गए। उन्होेंने अपने करीबी अन्य लोगों को दूसरे पदों के लिए खड़ा कर दिया। डॉ. संपूर्णानंद ने गुप्त के खिलाफ मुनीश्वर दत्त उपाध्याय को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़ा कर दिया। संपूर्णानंद के गुट से कमलापति त्रिपाठी कोषाध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे जबकि लाल बहादुर शास्त्री उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी थे। चुनावों के नतीजे नेहरू और संपूर्णानंद को गहरा झटका देने वाले थे। गुप्त लगभग 630 मतों से जीतकर प्रदेश अध्यक्ष चुन लिए गए। न सिर्फ खुद जीते बल्कि उनके पैनल के सभी उम्मीदवार भी जीत गए। चंद्रभानु गुप्त के समर्थन से कांग्रेस के कोषाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे चौधरी चरण सिंह ने कमलापति त्रिपाठी जैसे दिग्गज को पराजित कर दिया। उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे लाल बहादुर शास्त्री को भी पराजय का सामना करना पड़ा। इस घटना ने चंद्रभानु गुप्त की पकड़ व पहुंच तो मजबूत होने की बात प्रमाणित कर दी, लेकिन नेहरू का गुट इस पराजय को पचा नहीं पाया और गुप्त के खिलाफ लामबंदी और तेज हो गई।’