कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपीडा ने कन्नौज में जमीन खरीदने में स्वीकृत दरों से ज्यादा पर 3.65 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह जमीन लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए ली गई थी। इस मामले में सरकार का जवाब नहीं मिल सका। इसी तरह से यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलेपमेंट अथॉरिटी ने गौतमबुद्धनगर में एक बिजली सब स्टेशन के निर्माण के लिए रिकॉर्ड में जितनी जमीन है, उससे ज्यादा का भुगतान किया गया। कुल 2.71 करोड़ रुपये अधिक भुगतान किया गया।
पौधरोपण के लिए भुगतान के सभी वाउचर की जांच करवाए सरकार
वन विभाग में जेसीबी की जगह मोपेड से गड्ढे खोदवाने के मामले में संबंधित वर्षों में हुए भुगतान के सभी बिल वाउचर की जांच होनी चाहिए। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में सरकार से यह सिफारिश की गई है। यह भी कहा गया है कि 1.37 करोड़ रुपये के इस घपले में दोषी अफसरों के खिलाफ समय से और उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
कैग की रिपोर्ट बुधवार को विधान परिषद के पटल पर रखी गई। इसके अनुसार वर्ष 2016-17 से 2018-19 के बीच 20 वन प्रभागों में पौधरोपण के लिए गड्ढे खोदने, मिट्टी के काम, परिवहन और संरक्षण कार्यों के लिए ट्रैक्टर व जेसीबी का इस्तेमाल दिखाया गया। लेकिन ट्रैक्टर व जेसीबी के नाम पर जिन वाहनों के नंबर दर्ज किए गए, वे जांच में मोटरसाइकिल, जीप, स्कूटर और मोपेड के निकले। कैग ने रिपोर्ट में साफ किया है कि यह काम मौके पर हकीकत में कराया ही नहीं गया। इस तरह से 1,058 वाउचर के माध्यम से 1.37 करोड़ रुपये का घपला किया गया।
कैग ने कहा है कि इन वन प्रभागों के दिए गए वर्षों के सभी बिल वाउचर की जांच होनी चाहिए। क्योंकि ऑडिट में कुछ ही महीनों की नमूना चेकिंग की गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस मामले में सरकार ने अपने जवाब में कहा है कि 14 अधिकारी सस्पेंड किए गए हैं। 137 को आरोपपत्र दिए गए हैं जबकि 44 अधिकारी या तो सेवानिवृत्त हो गए या उनकी मौत हो गई। शेष दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक जांच की कार्यवाही प्रक्रिया में है।
कैंसर इंस्टीट्यूट के निर्माण के भुगतान में सामने आईं खामियां
कैग रिपोर्ट में लखनऊ के चक गंजरिया फार्म में बने उच्चस्तरीय कैंसर इंस्टीट्यूट के निर्माण कार्यों में हुए खर्च पर सवाल उठाए गए हैं। इसको बनाने का फैसला जून 2013 में लिया गया था और अक्तूबर 2015 में काम शुरू हुआ। इसमें उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम कार्यदायी संस्था थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि परियोजना को लागू करने में काफी देरी हुई। बढ़े हुए एस्टीमेट और औचित्य विवरण तैयार न किए जाने के कारण परियोजना पर 64.60 करोड़ रुपये अधिक खर्च हुआ। एक बढ़े हुए एस्टीमेट ने निविदा में प्रतिस्पर्धा को कम कर दिया। यूपीआरएनएन ने निर्माण एजेंसी और आर्किटेक्ट को 19.75 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान हुआ। कंक्रीट के काम में भी 4.02 करोड़ रुपये अधिक भुगतान हुआ। निर्माण एजेंसी को 3.25 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान हुआ। ट्रांसफार्मर, डीजी सेट्स और स्टैबलाइजर की अधिक संख्या में खरीद की गई, जिससे 2.30 करोड़ रुपये का गैर जरूरी खर्च हुआ। इस परियोजना में 36.68 करोड़ रुपये का ब्याज वर्ष 2015-21 केबीच मिला, जिसे सरकारी खजाने में जारी नहीं किया गया। इसी तरह से निर्माण एजेंसी को भी मिले ब्याज को सरकारी एकाउंट में नहीं दिखा गया।
इसके अलावा एक अन्य ऑडिट में कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपीआरएनएन ने ई-टेंडरिंग में समय-समय पर जारी शासनादेशों का उल्लंघन किया है। इससे 1.45 करोड़ रुपये का अनियमित भुगतान हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम ने राष्ट्रीय राजमार्ग-58 और 72 के हरिद्वार-देहरादून खंड पर काम के लिए निविदा मूल्य में जीएसटी को शामिल किए बिना ही निविदा प्रक्रिया में हिस्सा लिया, जिसके कारण एनएचएआई ने जीएसटी के दावे की प्रतिपूर्ति से मना कर दिया, जिससे सेतु निगम को 41.99 करोड़ रुपये राजस्व की हानि हुई।