लखनऊ। सफलता के लिए साधना और साधना के लिए लगन का होना जरूरी है। इन दोनों के जरिए जीवन के हर क्षेत्र में जीत हासिल की जा सकती है। भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के दीक्षांत में कथक में एमपीए करने वाली छात्रा पृथ्वी सिंह और गायन में एमपीए करने वाले कर्नूरी हरीश ने इसी जीवन दर्शन को अपनाया और शीर्ष पदक विजेताओं की सूची में पहले और दूसरे स्थान पर जगह बनाई। वहीं श्रीलंका से आई दासुनी आर्थिंक तंगी केबावजूद आगे बढ़ती रही और कथक में बीपीए पूरा किया और विभाग में पहले स्थान हासिल किया। इनकी सफलता प्रेरणा देने वाली है।
दो बेटियों की परवरिश और नृत्य साधना में साधा संतुलन
शादी के बाद लखनऊ निवासी बन चुकीं पृथ्वी सिंह कहती हैं कि मुझे गर्व है कि मैं दो बेटियों प्रशस्ति (7) और प्राख्या (5) की मां हूं। बीनी सिंह मैम व रूचि खरे मैम के निर्देशन में मैं आगे बढ़ने की कोशिश करती रही। मेरी सफलता का श्रेय मां मनोरमा देवी को जाता है। छोटी बेटी डेढ़ साल की थी तब मैं छह-सात घंटे भातखंडे में रहा करती थी। मैं निरंतर नृत्य साधना कर सकूं, इसलिए मां ने सहयोग किया। जब मैंने पति से से कहा कि कथक में पढ़ाई करनी है तो उन्होंने मेरा साथ दिया। हां, घर और नृत्य साधना में तालमेल मुश्किल था, लेकिन मेहनत, लगन और सहयोग से सुर और ताल मिलते गए और रिजल्ट सबके सामने है।
अनाथालय ने दी हुनर को पहचान
मूल रूप से आंध्रपदेश के निवासी कर्नूर हरीश 2017 में लखनऊ आए। कहते हैं कि सरस्वती गान सभा अनाथालय में पला-बढ़ा हूं। उन्होंने मेरे हुनर को पहचाना और मुझे भातखंडे में भेजा। आज भी मेरी आर्थिक मदद वे ही करते हैं। मैं जब यहां आया तो गैर भाषी होना मेरे लिए बड़ी चुनौती थी। मेरे उच्चारण का, स्वरों का मजाक बनाया जाता था। मेरी गुरु रंजना द्विवेदी और डॉ. सृष्टि माथुर ने इसमें मदद की। दोस्तों साहिल, विशाल, धर्मेन्द्र मेरी बोली को सुधरवाते और बताते थे कि क्या गलत है क्या सही है। डॉ. सीमा भारद्वाज मैम ने भी बहुत मदद की। आगे पीएचडी करशिक्षक बनना है। कोशिश यही रहेगी कि जिस तरह मुझ अनाथ को आधार मिला, उसी तरह कोई भी अनाथ अच्छी और अपनी पसंद की शिक्षा से वंचित न रहे। हरीश विश्वविद्यालय टॉपर में दूसरे स्थान पर हैं।
आर्थिक तंगी ने राह रोकी, पर हौसला नहीं
श्रीलंका निवासी ईए ईशानी उरेसा दासुनी 2019 में भातखंडे आई थीं। कहती हैं कि वहीं मेरी गुरू ने यहां की राह दिखाई। पापा केपास पैसे नहीं थे, वे सेना से रिटायर्ड हैं। इतना पैसा नहीं था कि वे यहां भेजकर पढ़ा सकें। मेरी आंटी ने मेरी मदद की, मेरी फीस का जिम्मा लिया और मुझे यहां भेजा। अब आगे क्या करूंगी मालूम नहीं, क्योंकि पैसा नहीं है। फिलहाल 18 को श्रीलंका जा रही हूं, वहां नृत्य सिखाऊंगी और आगे की पढ़ाई का खर्च निकालूंगी। भारत से दोस्तों का प्यार और गुरुओं का आशीर्वाद लेकर जा रही हूं।