आलमबाग में रामलीला का मंचन करते पात्र।
लखनऊ। बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी राजधानी में मंचित की जा रहीं रामलीलाओं का आनंद ले रहे हैं। डालीगंज में होने वाली मौसमगंज की रामलीला में नियमित जाने वाले मनीष गुप्ता कहते हैं कि लीलाओं का अपना आनंद है। हर रोज हम लोग दुकान बंद करने के बाद लीला देखने पहुंच जाते हैं। रविवार को भी बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। पहले पंडाल में जय श्रीराम के नारे लगे और फिर मंचन शुरू हुआ।
मौसमगंज में कैकेयी-मंथरा संवाद के बाद श्रीराम के वन गमन और केवट लीला का मंचन हुआ। मंथरा से संवाद के बाद कैकेयी ने राजा दशरथ से अपना वचन निभाने को कहा और राम को वनवास की घोषणा हो गई। राम से वन में मिलने पहुंचे भरत बड़े भाई की चरण पादुका लेकर लौट आए। राजाजीपुरम के डाकघर कॉलोनी मैदान में अहिल्या उद्धार और गंगा पूजन की लीला का मंचन किया गया। रामलीला से पहले कथा व्यास जवाहर लाल ने भागवत कथा सुनाई।
कैकेयी और भरत में हुआ संवाद
आलमबाग में श्री रेलवे रामलीला दशहरा कमेटी की ओर से वेजीटेबल ग्राउंड में अलग-अलग प्रसंगों का मंचन हुआ। भरत और शत्रुघ्न ननिहाल से लौटकर आते हैं। उन्हें राम के वनवास जाने का पता चलता है तो कैकेयी और भरत में तीखी बहस होती है। भरत कहते हैं-न मैं पैदा यहां होता, न ऐसी दुर्दशा होती। पशु योनि थी अच्छी, पर न माता कर्कशा होती। अंत में भरत चित्रकूट पहुंचते हैं और राम-भरत मिलाप के साथ ही लीला का समापन हो जाता है।
केवट ने राम को नाव में बैठाने से किया इन्कार
ऐशबाग रामलीला मैदान के तुलसी मंच पर राम का वन की ओर प्रस्थान हो चुका है। वह जब नदी पार कराने के लिए केवट से कहते हैं तो केवट पहले उन्हें यह कहकर इन्कार कर देते हैं कि आपके पांव में जादू है जिससे पत्थर भी स्त्री का रूप ले लेते हैं। हालांकि बाद में वे कहते हैं कि बिना पैर धुलाए वह श्रीराम को नाव में बैठने नहीं देंगे। इसके बाद केवट राम के पैर धुलवाकर उन्हेे सरयू पार कराते हैं।