लखनऊ। संगीत नाटक अकादमी (नई दिल्ली), क्षेत्रीय केंद्र (गुवाहाटी) एवं भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की ओर से सत्तरहवें सत्रिय संगीत समारोह की दो दिवसीय बरगीत कार्यशाला का भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के गायन विभाग में समापन हुआ। कार्यशाला के विशेषज्ञ अकादमी पुरस्कार प्राप्त असम के गुनींद्रनाथ ओजा ने छात्रों को बारीकियां बताईं।
उन्होंने बताया कि सत्रिय परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली पारंपरिक शास्त्रीय कला है जिसका संबंध मार्गी संगीत से माना जाता है। यह 500 साल पुरानी कला है जिसको अनेक पीढ़ियों ने आज भी जीवंत रखा है। श्रीमंत जगत गुरु शंकर देव और उनके परम शिष्य माधव देव, दोनों ने मिलकर 143 बर गीतों की रचना की थी। इन रचनाओं को सत्रिय परंपरा में जीवंत रखा जा रहा है। यह शास्त्रीय अंग की कला है जो विभिन्न रागों व तालों में निबद्ध होती है। इसकी विशिष्टता है कि ये वैष्णो संप्रदाय से जुड़ी है और इसके पद श्रीराम और श्री कृष्ण की लीलाओं व कथाओं से जुड़े होते हैं। समयानुसार रागों का प्रयोग इसके पदों में होता है। यह पूर्णतः शास्त्रीय कला है।