केजीएमयू में सिलिकॉन और एक्रेलिक जैसे पदार्थों से कृत्रिम आंख बनाने की शुरुआत की गई है। ये देखने में असली आंख जैसी लगती हैं। मांसपेशियां सही होने पर ये झपकने के साथ ही इधर-उधर घूम भी सकती हैं। केजीएमयू के प्रोस्थोडॉन्टिक्स क्राउन एंड ब्रिज्स विभाग में जल्द इसके लिए विशिष्ट क्लीनिक की शुरुआत की जाएगी।
विभागाध्यक्ष प्रो. पूरनचंद ने बताया कि अभी तक परंपरागत साधनों का उपयोग होने की वजह से ये आंखें उतनी सुडौल और सटीक नहीं बन पाती थीं। विभाग ने इसमें सुधार के लिए सिलिकॉन और एक्रेलिक का उपयोग शुरू किया है। इस क्लीनिक में आने वाले मरीजों की आंख की माप लेकर इनका निर्माण किया जाता है। इसका ट्रायल शुरू कर दिया गया है। इस समय हर सप्ताह दो से तीन मरीज आते हैं। जानकारी होने पर इसकी संख्या और बढ़ेगी। इसके बाद इस काम के लिए सप्ताह में एक दिन तय कर दिया जाएगा और विशेषज्ञों की टीम कृत्रिम आंख लगाने का काम करेगी।
ट्यूमर और दुर्घटना में आंख गंवाने वालों को फायदा
प्रो. पूरनचंद ने बताया कि किसी दुर्घटना या बीमारी में आंख गंवाने वाले मरीजों के लिए नई तकनीक वरदान है। आंख में ट्यूमर के मामलों में उसे पूरी तरह से निकालना पड़ता है। इसमें बच्चों की भी काफी संख्या होती है। इन कृत्रिम आंखों से उनको इस लायक बनाया जा सकता है कि वे सामाजिक भेदभाव का शिकार न हों।
महज एक हजार रुपये में सुविधा
केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. सुधीर सिंह ने बताया कि किसी व्यक्ति की एक आंख न होने पर उसे सामाजिक रूप से काफी परेशान होना पड़ता है। हर जरूरतमंद को इसका फायदा मिल सके इसलिए इसकी कीमत बेहद कम रखी गई है। महज एक हजार रुपये में मरीजों को इसका लाभ मिल सकेगा।