अमृतलाल नागर का जन्म तो आगरा के एक गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पर, वह लखनऊ आए तो यहीं के होकर रह गए। बात कमलापति त्रिपाठी के मुख्यमंत्रित्व काल की है। भगवतीचरण वर्मा उत्तर प्रदेश हिंदी समिति के अध्यक्ष बनाए गए। भगवती बाबू तो अपनी ही मस्ती में रहने के आदी थे। किसी की धौंस और धमकी बर्दाश्त करना तो उनके खून में ही नहीं था। नतीजतन अधिकारियों से पटरी नहीं खाई और उन्होंने एक वर्ष में ही जेब से इस्तीफा निकालकर मुख्यमंत्री को भिजवा दिया। कमलापति त्रिपाठी ने समझाया और मनाया लेकिन नहीं माने। वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानचंद जैन ने संस्मरण में लिखा है, ‘भगवती बाबू ने जब हिंदी समिति का अध्यक्ष पद दोबारा संभालना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया तो अमृतलाल नागर को अध्यक्ष बनाने का फैसला किया गया। पर, नागर जी ने यह कहते हुए सरकार से मना कर दिया, ‘मैं इस पद को तभी संभालूंगा जब भगवती बाबू आश्वस्त कर देंगे कि वह इसका बुरा नहीं मानेंगे।’ मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने भगवती बाबू से आग्रह किया। भगवती बाबू ने नागर जी को आश्वस्त किया कि वह इसका बुरा नहीं मानेंगे। तब नागर जी ने हिंदी समिति के अध्यक्ष पद को स्वीकार किया। अध्यक्ष पद स्वीकार करने के बाद वह घर पहुंचे और एलान कर दिया, ‘हिंदी समिति के अध्यक्ष पद के नाते जो मानदेय मिलेगा, उससे एक पाई भी घर पर खर्च नहीं होगी। पूरा मानदेय एक बैंक में लेखक फंड का अकाउन्ट खोलकर जमा कर दिया जाए। जिससे जरूरतमंद लेखकों व साहित्यकारों की मदद की जाएगी। कहा, जो पद टिकाऊ नहीं उसका मानदेय घर पर खर्च करके आदत बिगाड़ना ठीक नहीं।’