अपने नेताजी उनके मुरीद हैं। वे हैं कि अपने सुनहरे अतीत की परछाइयों से बाहर नहीं निकल पा रहे।
मुहैया कराया गया तामझाम भी उन्हें हाकिम-सा ही अहसास दिलाता रहता है। उनका हमसाया, इशारा मिलते ही जब तब ‘दिग्गजों’ को फोन घुमाता रहता है।
वे शहर में कभी भी कहीं भी गुरिल्ला छाप शैली में टहलने पहुंच जाते हैं।
गोमतीनगर वाकये के बाद अब अपने ‘चिरैयाघर’ में भी उनके नाम की माला जपी जा रही है। चच्चा यहां कुछ दिनों पहले ढलती शाम अचानक ही घूमने आए थे, विदेशी जानवर मंगवाने का फरमान भी दे डाला।
उनकी हर चहलकदमी सुर्खियां बनीं। लेकिन न जाने वो किस घड़ी में आए थे कि उसके बाद ‘चिरैयाघर’ में आफत आ गई। पहले तो कई बेजुबानों ने दम तोड़ दिया।
परिसर का हर कर्मचारी गाहे-बगाहे उनके आने की घड़ी को कोस रहा है ‘चच्चा ना जाने कउनी सईत आय रहैं’?