यही समाजवाद है। यहां तो वजीर भी राजा को निर्देश देते हैं। सूबे के मुखिया उम्र में बहुत छोटे हैं उनकी रियासत के कई वजीर उन्हें बचपन से जानते हैं।
इसलिए वे उन्हें राजा मानने को ही तैयार नहीं। ऐसे ही सूबे के एक वजीर हैं जो हर समय तल्खी में रहते हैं।
वे जब भी राजा के पास कोई फाइल भेजते हैं उसमें पद के अनुरूप आग्रह के बजाय निर्देश की भाषा लिखी होती है।
पिछले दिनों की ही बात है वजीर ने अल्पसंख्यक मामले की एक महत्वपूर्ण फाइल राजा के पास भेजी। इसमें उन्होंने लिखा कि कृपया इस महत्वपूर्ण मामले में अपना अनुमोदन देना चाहें...।
इसके बाद उन्होंने यह भी लिखा कि इस मामले में शीघ्रता भी दिखाएं...।
यही तो बात है इन वजीर साहबान की, वे अनुरोध के साथ ही राजा को समय-समय पर निर्देशित भी कर देते हैं।