कर्नाटक चुनाव के बाद अखिलेश यादव के मिशन दक्षिण को बल मिलेगा। यहां पार्टी खाता खोलने में सफल नहीं हुई है, लेकिन वोटबैंक बढ़कर 0.03 फीसदी पर पहुंच गया है। अफजलपुर में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 5.42 फीसदी वोटबैंक हासिल किया है। ऐसे में अब पार्टी यहां लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है।
समाजवादी पार्टी कर्नाटक में लगाता सक्रिय रही है। एक वक्त था कि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगराप्पा सपा में शमिल हो गये थे। उनके निधन के बाद पार्टी लगातार जड़ें जमाने के प्रयास में जुटी हुई है। अखिलेश यादव ने कर्नाटक से इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी की है। ऐसे में वो अक्सर कर्नाटक से अपना लगाव भी दिखाते रहे हैं। वर्ष 2018 के चुनाव में पार्टी ने 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी को 0.02 फीसदी ही वोट मिला था।
इस वर्ष सपा ने यहां 14 उम्मीदवार उतारे। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव तीन दिन तक कर्नाटक में रहे और पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में जनसभा व रोड शो किया। उन्होंने अफजलपुर में खासतौर से फोकस किया था, जहां 5.42 फीसदी वोट मिला है। पार्टी का दावा है कि अन्य सीटों पर भी वोटबैंक प्रतिशत में मामूली बढोतरी हुई है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार दक्षिण के राज्यों में सक्रिय हैं।
वह तेलंगाना, तमिलनाडू सहित अन्य राज्यों में जाकर भाजपा के खिलाफ मुहिम चला चुके हैं। ऐसे में कर्नाटक का चुनाव परिणाम उनकी मुहिम को ताकत देगा। सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और कर्नाटक प्रभारी राजीव राय कहते हैं कि कर्नाटक में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के जाने के बाद भाजपा के खिलाफ चल रही मुहिम को बल मिला है। सपा उम्मीदवारों भले नहीं जीते हैं, लेकिन विपक्षी एकजुटता को ताकत मिली है। यहां भाजपा व कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई कराने में सपा की अहम भूमिका रही है। अब कर्नाटक में लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू होगी।
भाजपा व जद (एस) का ग्राफ गिरा
कर्नाटक में भाजपा का वोटबैंक 36.35 से घटकर 35.92 फीसदी और जद (एस) का 18.30 फीसदी से घटकर 13.33 फीसदी, बसपा 0.32 फीसदी से घटकर 0.31 फीसदी पर पहुंच गया, जबकि कांग्रेस का 38.14 फीसदी से बढ़कर 42.98 फीसदी पहुंच गया है।
भाजपा की नफरत की राजनीति का अंतकाल शुरू : अखिलेश
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि कर्नाटक का संदेश ये है कि भाजपा की नकारात्मक, सांप्रदायिक, भ्रष्टाचारी, अमीरोन्मुखी, महिला-युवा विरोधी, सामाजिक-बंटवारे, झूठे प्रचारवाली, व्यक्तिवादी राजनीति का ‘अंतकाल’ शुरू हो गया है। ये नये सकारात्मक भारत का महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार व वैमनस्य के खिलाफ सख्त जनादेश है।