बाराबंकी। खेल पर चर्चा हो और बाराबंकी के महान हॉकी खिलाड़ी केडी सिंह बाबू का नाम न आए, भला ऐसा कैसे हो सकता है। आज करीब 100 देश में हॉकी खेली जा रही है मगर केडी सिंह बाबू भारत के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्हे खेलों का नोबेल हेम्स ट्रॉफी मिली। हाॅकी में दुनिया के किसी भी खिलाड़ी को यह सम्मान नहीं मिला। बाबू की इस उपलब्धि को पूरा हॉकी जगत अजेय मानता है।
कुंवर दिग्विजय सिंह बाबू उर्फ केडी सिंह बाबू का जन्म दो फरवरी 1922 को हुआ था। उन्होंने मात्र 14 साल की उम्र मं हॉकी खेलना शुरु किया। 1938 में दिल्ली के एक टूर्नामेंट में उन्होंने उस जमाने के मशहूर ओलंपियन मोहम्मद हुसैन को चकमा देकर गोल किया तो लोग दंग रह गए।
करीब 16 साल तक यूपी की टीम का प्रतिनिधित्व करने वाले बाबू 1948 में भारतीय हॉकी टीम के उपकप्तान बने। वर्ष 1949 में कुल 236 गोल हुए जिसमें अकेले 99 गोल केडी सिंह के थे। इसलिए उन्हे भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। लंदन व हेलसिंकी ओलिंपिक खेल में जबरदस्त प्रदर्शन कर भारत को लगातार दो स्वर्ण पदक दिलाने वाले बाबू को खेल और कप्तानी को देखते हुए लॉस एंजिल्स की हेम्सफ़र्ड फ़ाउंडेशन ने उन्हें हेम्स ट्रॉफी दी।
15 किलो की चांदी की एक शील्ड लेकर जब बाबू देश लौेटे तो पूरा हर एक भारतवासी झूम उठा। हाॅकी में दुनिया के किसी खिलाड़ी को यह ट्राॅफी आज 61 साल बाद भी नहीं मिल सकी है। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के जन्म दिवस पर ही खेल दिवस मनाया जाता है और केडी सिंह व ध्यानचंद की दोस्ती जगजाहिर है।
गांव की बेटी कविता ने एथलेटिक्स में जीते कई पदक
रामसनेहीघाट तहसील के दुलहदेपुर गांव की कविता यादव कभी गांव की पगडंडियों पर दौड़ती थी। उनके भाई आशीष ने हौसला बढ़ाया तो 2012 में पहली बार गांव की इस बेटी ने रांचीं में पांच हजार मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीतकर बाराबंकी का नाम रोशन किया। इसके बाद प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते। 2019 में नेपाल में 13वें एशियन गेम्स में कविता ने रजत पदक जीता। 2020 में मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया पर आयोजित 21 किमी की मैराथन कविता ने एक घंटा 59 मिनट 59 सेकेंड में पूरी कर पहला स्थान प्राप्त किया।