ताइवानी मंत्रालय ने कहा कि हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी के नेतृत्व में अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी से स्वागत करता है। यह 25 साल में यूएस हाउस स्पीकर की पहली यात्रा है। इससे ताइवान-अमेरिका संबंधों के लिए उच्च-स्तरीय समर्थन और इसके व्यापक दायरे का पता चलता है। इससे हमारा द्विपक्षीय सहयोग और मजबूत होगा। ताइवान के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, स्पीकर पेलोसी के पहले एशियाई दौरे के कार्यक्रम में ताइवान को शामिल करना पूरी तरह से उस उच्च सम्मान को दिखाता है। स्पीकर पेलोसी और कांग्रेस के अन्य प्रमुख सदस्यों की यात्रा ताइवान और अमेरिका के बीच घनिष्ठ और सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ाएगी और दोनों देशों के बीच व्यापक क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग को और गहरा करेगी।
पेलोसी के रवाना होने के थोड़ी ही देर बाद 27 चीनी लड़ाकू विमान ताइवान के हवाई क्षेत्र में पहुंचे। पेलोसी के दौरे के एलान के बाद से ही चीन लगातार अमेरिका और ताइवान को धमकाता रहा है।
अमेरिकी संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी साउथ कोरिया पहुंचने वाली हैं। थोड़ी देर पहले ही उनके विमान ने ताइवान से उड़ान भरी थी।
अमेरिकी संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी चीन के विरोध के बावजूद मंगलवार को ताइवान की राजधानी ताईपेई पहुंच गईं थीं। 25 साल बाद ये पहली बार था, जब अमेरिकी स्पीकर ताइवान के दौरे पर थीं। इससे पहले 1997 में उस समय के स्पीकर न्यूट गिंगरिक यहां पहुंचे थे। पेलोसी के दौरे से बौखलाए चीन ने तमाम एलान कर डाले। ताइवान और अमेरिका को डराने की हर कोशिश की। पढ़ें पूरी खबर
ताइवान दक्षिण पूर्वी चीन के तट से करीब 100 मील दूर स्थिति एक द्वीप है। ताइवान खुद को संप्रभु राष्ट्र मानता है। उसका अपना संविधान है। ताइवान में लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार है। वहीं चीन की कम्युनिस्ट सरकार ताइवान को अपने देश का हिस्सा बताती है। चीन इस द्वीप को फिर से अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताइवान और चीन के पुन: एकीकरण की जोरदार वकालत करते हैं। ऐतिहासिक रूप से से देखें तो ताइवान कभी चीन का ही हिस्सा था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...
ताइवान की रक्षा के लिए अमेरिका उसे सैन्य उपकरण बेचता है, जिसमें ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर भी शामिल हैं। ओबामा प्रशासन ने 6.4 अरब डॉलर के हथियारों के सौदे के तहत 2010 में ताइवान को 60 ब्लैक हॉक्स बेचने की मंजूरी दी थी। इसके जवाब में, चीन ने अमेरिका के साथ कुछ सैन्य संबंधों को अस्थायी रूप से तोड़ दिया था। अमेरिका के साथ ताइवान के बीच टकराव 1996 से चला आ रहा है। चीन ताइवान के मुद्दे पर किसी तरह का विदेशी दखल नहीं चाहता है। उसकी कोशिश रहती है कि कोई भी देश ऐसा कुछ नहीं करे जिससे ताइवान को अलग पहचान मिले। यही, वहज है अमेरिकी संसद की स्पीकर के दौरे से चीन भड़क गया है।