आरएसएस के शताब्दी समारोह के बीच, उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने गुरुवार को कहा कि संघ धर्म, जाति या भाषा के भेदभाव के बिना सभी को गले लगाता है और विविधता में एकता का प्रतीक है। वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया के सर्वोच्च राष्ट्र के रूप में उभरेगा। उन्होंने कहा कि इस समावेशी दृष्टिकोण ने आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों को निरंतर सफलता दिलाई है और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास को गति दी है।
सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा एक पोस्ट में उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि दुनिया के सबसे प्रमुख देशभक्त संगठन के 100 वर्ष पूरे होने पर, इसका सबसे बड़ा योगदान एक मजबूत समाज के लिए आवश्यक आत्म-अनुशासित और जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण करने का मानव-निर्माण सिद्धांत है। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा अपनी स्थापना के बाद से, आरएसएस युवाओं को एक मजबूत आंतरिक चरित्र निर्माण और स्वेच्छा से समाज की सेवा करने के लिए प्रेरित करता रहा है। उन्होंने कहा कि इस महान यात्रा में, आरएसएस की भूमिका महत्वपूर्ण है, और यह समय के साथ कायम रहेगी और सफल होगी।
संघ प्रमुख ने कहा 'सभी विविधताओं के साथ हमें एक सूत्र में पिरोने वाली भारतीय राष्ट्रीयता है, हिंदू राष्ट्रीयता है। जिसे हिंदू शब्द से आपत्ति है,वह हिंदवी कहे, आर्य कहे। हमारा राष्ट्र राज्य पर आधारित कल्पना नहीं है। हमारी संस्कृति राष्ट्र बनाती है। देश आते जाते रहते हैं, राष्ट्र सदा विद्यमान होते हैं। हमने गुलामी झेली, आक्रमण झेले लेकिन इनके बावजूद सनातन, हम आज भी मौजूद हैं। वसुधैव कुटम्बकम की धारणा इसी समाज ने दी है। संघ, हिंदू समाज को संगठित करने का काम कर रहा है। एक बार समाज संगठित हो गया तो वह अपने बल पर सारे काम कर सकता है।'
संघ प्रमुख ने कहा कि 'पूरी दुनिया में परिवार व्यवस्था थी, लेकिन आज वह भारत को छोड़कर हर देश में ध्वस्त हो चुका है। परिवार व्यवस्था से ही समाज और व्यक्ति का निर्माण होता है। केवल आदत बदलने से ही परिवर्तन आता है, सिर्फ सोचने से ही बदलाव नहीं आता। संघ की शाखा आदत बदलने की ही व्यवस्था है। संघ को लालच देकर बदलने की कोशिश की गई, लेकिन संघ ने इसे कभी नहीं बदलने दिया। संघ के स्वयंसेवक वर्षों से शाखा का आयोजन कर रहे हैं क्योंकि ये उनकी आदत है। संघ की शाखा से ही स्वयंसेवकों में भक्ति का, राष्ट्र निर्माण की भावना पैदा होती है। हमारी परंपरा है कि हम हर विचारधारा का सम्मान करते हैं और उन्हें स्वीकार करते हैं। आज अपने देश में इन विविधताओं से बांटने की कोशिश हो रही है। हमारे बीच विविधता है, लेकिन इनके बावजूद हम एक हैं। इस एकता के चलते हमारा सभी का व्यवहार सांप्रदायिक सद्भाव का होना चाहिए। जैसे अनेक बर्तन साथ रखें तो कभी कभी आवाज हो सकती है, लेकिन हमें हर छोटी-बड़ी बात पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए।'
मोहन भागवत ने कहा कि 'संघ अपनी दृष्टि और परंपरा से चलते हुए 100 साल पूरे कर चुका है। स्वयंसेवक और समाज के संकलित अनुभव संघ का चिंतन है। सारी दुनिया आगे चली गई है, हम भी आगे चले गए हैं। अब अगर हम तुरंत पीछे आएंगे तो गाड़ी उलट जाएगी। ऐसे में हमें धीरे-धीरे परिवर्तन करने होंगे और अपना खुद का विकास पथ बनाकर दुनिया के सामने रखेंगे तो सही विकास होगा। दुनिया को धर्म की दृष्टि देनी होगी। वो धर्म पूजा, खान-पान नहीं है, वो सभी को साथ लेकर चलने वाला और सभी का कल्याण करने वाला धर्म है। हमें विश्व को ये दृष्टि देनी होगी। लेकिन व्यवस्थाएं उसे नहीं बना सकतीं। व्यवस्थाएं मनुष्य बनाता है। वो जैसा है वैसी ही व्यवस्थाएं बनाएगा। जैसा समाज है, वैसी ही व्यवस्था चलेगी। इसलिए समाज के आचरण में बदलाव आना चाहिए।'
उन्होंने कहा कि 'मानव का भौतिक विकास होता है, नैतिक विकास नहीं होता। आज अमेरिका को आदर्श माना जाता है और लोग चाहते हैं कि भारत, अमेरिका जैसा जीवन जिए,लेकिन जानकार मानते हैं कि उसके लिए और पांच पृथ्वियों की जरूरत होगी, तो वैसा विकास नहीं हो सकता। हमारी दृष्टि भौतिकता के साथ-साथ मानवता के विकास की भी है। हजारों वर्षों तक दुनिया में हमने इस दृष्टि से सुंदर, शांतिपूर्ण और मनुष्य और सृष्टि का सहयोगी जीवन प्रस्थापित किया था। आज फिर दुनिया भारत से अपेक्षा कर रही है और नियति यही चाहती है कि हम विश्व को फिर से ऐसा रास्ता दे।'
मोहन भागवत ने कहा कि 'आज पूरी दुनिया में अराजकता का माहौल है। ऐसे समय में पूरी दुनिया भारत की तरफ देखती है। आशा की किरण ये है कि देश की युवा पीढ़ी में अपने देश और संस्कृति के प्रति प्रेम बढ़ा है। समाज खुद को सक्षम महसूस करता है और सरकार की पहल से खुद ही समस्याओं का निदान करने की कोशिश कर रहा है। बुद्धिजीवियों में भी अपने देश की भलाई के लिए चिंतन बढ़ रहा है।'
संघ प्रमुख ने कहा कि प्रजातांत्रिक मार्गों से ही परिवर्तन आता है। हिंसा से ऊथल-पुथल आती है, लेकिन पूरी तरह से परिवर्तन नहीं हुआ। हाल के समय में विभिन्न देशों में कथित क्रांतियां हुईं, लेकिन कहीं कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो सका। हमारे पड़ोसी देशों में हिंसक ऊथल-पुथल होना हमारे लिए चिंता का विषय है। हमारा पड़ोसी देशों के साथ आत्मीयता का संबंध है। इससे चिंता होती है।
संघ प्रमुख ने कहा कि प्रचलित अर्थ प्रणाली के अनुसार, देश आर्थिक विकास कर रहा है। लेकिन प्रचलित अर्थ प्रणाली के कुछ दोष भी सामने आ रहे हैं। इस व्यवस्था में शोषण करने के लिए नया तंत्र खड़ा हो सकता है। पर्यावरण की हानि हो सकती है। हाल ही में अमेरिका ने जो टैरिफ नीति अपनाई, उसकी मार सभी पर पड़ रही है। ऐसे में हमें मौजूदा अर्थ प्रणाली पर पूरी तरह से निर्भर नहीं होना चाहिए। निर्भरता मजबूरी में न बदलनी चाहिए। इसलिए निर्भरता को मानते हुए इसको मजबूरी न बनाते हुए जीना है तो स्वदेशी और स्वावलंबी जीवन जीना पड़ेगा। साथ ही राजनयिक, आर्थिक संबंध भी दुनिया के साथ रखने पड़ेंगे, लेकिन उन पर पूरी तरह से निर्भरता नहीं रहेगी।
विजयदशमी कार्यक्रम के अवसर पर अपने संबोधन में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा यह वर्ष गुरु तेग बहादुर के बलिदान का 350वां वर्ष है। हिंद की चादर बनकर गुरु तेग बहादुर ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। बीते दिनों देश में पहलगाम में दुखद दुर्घटना हुई, लोगों को धर्म के पूछकर उनकी हत्या की गई। हमारी सरकार और सेना ने उस हमले का पुरजोर जवाब दिया। इसमें हमारी सेना की बहादुरी, नेतृत्व की दृढ़ता और देश की एकता देखने को मिली। इस घटना के बाद दुनिया में हमें पता चला कि हमारे मित्र कौन-कौन हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ के 100 साल पूरे होने के अवसर पर बधाई दी। सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा कि 'आज से 100 साल पहले विजयादशमी के दिन ही समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी। लंबे कालखंड के दौरान असंख्य स्वयंसेवकों ने इस संकल्प को साकार करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसे लेकर मैंने अपने विचारों को शब्दों में ढालने का प्रयास किया है।'
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने विजयदशमी उत्सव के अवसर पर संघ मुख्यालय में शस्त्र पूजा की।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में आरएसएस विजयादशमी उत्सव कार्यक्रम में संगठन के संस्थापक के.बी. हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस समारोह के मुख्य अतिथि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी उपस्थित थे।
संघ का विजयदशमी उत्सव की शुरुआत हो गई है। संघ प्रमुख मोहन भागवत, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस मंच पर मौजूद हैं। फिलहाल स्वयंसवेकों द्वारा परेड की जा रही है।
संघ के विजयदशमी उत्सव कार्यक्रम में इस साल पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बतौर मुख्य अतिथि शामिल होंगे। रामनाथ कोविंद बुधवार को ही नागपुर पहुंच गए थे।