विज्ञानं ने आज बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि अकेले भारत में 10 प्रतिशत नवजात शिशु जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Disease) की वजह जी नहीं पाते हैं। जन्मजात हृदय रोग सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। ऐसा नहीं है कि चिकित्सकों के पास इस बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन समय पर इलाज न मिल पाने की वजह से पूरी दुनिया में शिशु मृत्यु बढ़ रही है। कई बार माता-पिता समझ ही नहीं पाते और जब तक उन्हें पता चलता है, तब तक बहुत देर हो जाती है।
दरअसल, जन्मजात हृदय रोग से पीडित नवजात के पास ज्यादा समय नहीं होता है। कुछ केसों में तो नवजात के जन्म लेने के कुछ घंटों बाद या उसी दिन ऑपरेशन की जरुरत होती है। जन्मजात हृदयरोग से पीडित ज्यादातर नवजातों को जल्दी इलाज की जरुरत होती है। यह बेहद जरूरी है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए '
द हंस फाउंडेशन' (The Hans Foundation- THF)ने कदम आगे बढ़ाया है।
'द हंस फाउंडेशन' ने जन्मजात हृदय रोग से लड़ने के लिए मुंबई के वॉकहार्ट हॉस्पिटल और नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट (नई दिल्ली) के साथ हाथ मिलाया है। इसका मकसद है जन्मजात हृदय रोग पीडि़तों को समय रहते इलाज मुहैया कराना।
पूरे देश के जरूरतमंदों को इलाज कराना है मकसद
'द हंस फाउंडेशन' अपने मिशन के तहत पूरे भारत के उन नवजातों और बच्चों को इलाज मुहैया करा रहा है, जो जन्मजात हृदय रोग से ग्रस्त हैं। ऐसे बच्चे और नवजात, जिनके माता-पिता उनका इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं। 'द हंस फाउंडेशन' ऐसे बच्चों को साउथ मुंबई के वॉकहार्ट हॉस्पिटल और दिल्ली के ईस्ट ऑफ कैलाश स्थित नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट की मदद से इलाज दे रहा है।
'द हंस फाउंडेशन' ने 2016 में शुरू किया था मिशन
'द हंस फाउंडेशन' ने 2016 में लिटिल हार्ट प्रोग्राम के तहत वॉकहार्ट हॉस्पिटल और नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट के साथ मिशन की शुरुआत की। 'द हंस फाउंडेशन' गरीबी रेखा के तहत आने वाले परिवारों को हार्ट सर्जरी के लिए वित्तीय मदद भी देने के साथ ही जरूरतमंदों का इलाज कराने में भी बढ़ चढ़कर कार्य कर रहा है।
लिटिल हार्ट प्रोग्राम से जुड़ी अहम बातें
लिटिल हार्ट प्रोग्राम के तहत 'द हंस फाउंडेशन' अब तक 140 सर्जरी करा चुका है। इस काम में वॉकहार्ट हॉस्पिटल, साउथ मुंबई और नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली फाउंडेशन का साथ निभा रहे हैं।