मधुमक्खियों के अस्तित्व का एकमात्र मकसद हमारी फसलों का परागण करना नहीं है। असल में मधुमक्खियां हमारी फसलों से अपना खाना हासिल करती हैं और बदले में परागण जैसी बेशकीमती चीज अदा करती हैं। व्यावसायिक नजरिये से देखें तो मधुमक्खियां उन बड़े रईसों की तरह हैं, जो आधा डॉलर के बिल पर 10 डॉलर टिप देते हैं। हमें इसके लिए इनका शुक्रगुजार होना चाहिए।जिसे भी अभी और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ग्रह पर जीवन की फिक्र है, उसे इस खतरे की घंटी को सुनना होगा। मधुमक्खियों की तादाद जितनी कम होगी, फल और सब्जियों की उपलब्धता उतनी की कम होगी और कीमतें उतनी ही ज्यादा। मधुमक्खियां नहीं होने का मतलब है, बादाम, कॉफी, अल्फा-अल्फा, कीवी, सेब, अंगूर, आम, नाशपाती, आडू, स्ट्रॉबेरी, अखरोट, तरबूज जैसा कोई भी फल जो परागण पर निर्भर है, हमें नहीं मिलेगा। अगर हमें अच्छा और साफ सुथरा खाना-पीना चाहिए, तो हमें मधुक्खियों को भी वैसा ही खाना मुहैया कराना होगा। अगर मधुमक्खियों के पास पर्याप्त साफ-सुथरा खाना नहीं होगा, तो जाहिर है, हमारे लिए भी फल और सब्जियों का घाटा होगा। अगर कोई सुन सके, तो मरती हुई मधुमक्खियां यही चीखते हुए मर रही हैं कि इंसानों, तुम्हारे प्रदूषित शहरों और कीटनाशकों से भरे खेतों में मैं अब और नहीं जी सकती।”