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World Earth Day 2019: खत्म होती जा रही हैं मधुमक्खियां, जानिए इनके बिना कैसा होगा जीवन

Mon, 22 Apr 2019 04:04 PM IST
पंखुड़ी सिंह अंकिता बंगवाल
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जिसे भी अभी और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ग्रह पर जीवन की फिक्र है, उसे इस खतरे की  घंटी को सुनना होगा। दुनिया भर में  मधुमक्खियां कम हो रही हैं। सच यह है कि मधुमक्खियों की तादाद जितनी कम होगी, फल और सब्जियों की उपलब्धता उतनी की कम होगी और कीमतें उतनी ही ज्यादा। वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर मधुमक्खियां नहीं रहेंगी, तो इंसान का वजूद भी नहीं रहेगा। सोचिए अगर धरती से मधुमक्खियों का नामोनिशान तक मिट जाए? उनके डंक से मिलने वाले दर्द से आपको तो छुटकारा मिल ही जाएगा, लेकिन एक चीज और है, जिससे आपको हाथ धोना पड़े। नहीं... शहद नहीं... वह जीवन है, आपका जीवन। यह सुनकर आपको थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि खुद अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने की थी। उन्होंने कहा था, "अगर मधुमक्खियां धरती से गायब हो जाती हैं, तो मनुष्य के पास जीवन जीने के लिए केवल चार साल होंगे। जब मधुमक्खियां नहीं रहेंगी, तो न पोलिनेशन (परागण) होगा, न पौधे, न पशु और न ही मनुष्य बचेगा।"
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अब सवाल है कि ऐसा क्यों होगा? इस सवाल का उत्तर जानने से पहले, यह जानना महत्वपूर्ण है कि मधुमक्खियां 70 फीसदी फसलों को परागण करती हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो उपभोग किए जाने वाले भोजन का एक तिहाई हिस्सा हमें मधुमक्खियों के परागण से ही मिलता है। अगर मधुमक्खियां नहीं होंगी, तो तीन महीने के भीतर दुनिया भर में फसल की पैदावार घट जाएगी। आपकी किराने की दुकान इसकी उपज का लगभग आधा हिस्सा खो देगी। वहीं, छह महीने के भीतर अधिकांश खेतों को गेहूं और मकई के खेतों में बदलना होगा, क्योंकि गेहूं और मक्के का परागण हवा द्वारा ही होता है। हमारे आहार को नुकसान होगा। कम विविध और कम पौष्टिक भोजन होगा। कुपोषण के कारण स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पैदा होंगी और चिकित्सा लागत उनके साथ बढ़ेगी। खाद्य और दवा के आसमान छूते   दामों के रूप में हमारी अर्थव्यवस्था गंभीर रूप  धारण करेगी। 
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संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कपास निर्यातक है। जहां उद्योग प्रति वर्ष 25 बिलियन डॉलर में होता है और करीब 200,000 लोगों को रोजगार मिलता है। सोचिए मधुमक्खियों का न होना, कपास को किस तरह और किस स्तर पर प्रभावित करेगा। कैनोला तेल की ही बात करें, आप इसे सिर्फ खाना पकाने के लिए सोच सकते हैं, लेकिन यह एक मूल्यवान जैव ईंधन है, जो मधुमक्खियों के बिना कैसे होगा? यानी दुनिया को पहले से अधिक पर्यावरण पर तनाव को बढ़ाते हुए, अधिक कोयले और जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहना होगा। भारत में, वर्ष 2002 के बाद से ओडिशा के किसान इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि हर साल कम मधुमक्खियां ही खेतों में जाती हैं। यह मधुमक्खियों की केवल एक ही प्रजाति नहीं थी, जो गायब होने लगी, बल्कि कई (एपिस मेलिफेरा, एपिस डोरसाटा और एपिस सेरैना इंडिका) थीं। ओडिशा के किसान यह बात बताने वाले अकेले नहीं हैं। वर्षों से, पंजाब, केरल, महाराष्ट्र और त्रिपुरा के अलावा अन्य जगहों पर भी किसानों से ऐसी ही जानकारियां मिलती रही हैं। इनकी प्रजातियों के विलुप्त होने की रिपोर्ट पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आम हो गई है और मानव अस्तित्व को बचाने के लिए इस पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। अचानक मधुमक्खियों के गायब होने के इस रहस्य ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को कई वर्षों तक परेशान किया है।
 

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कुछ अध्ययनों ने इसका एक बड़ा कारण नियोनिकोटिनॉइडस (कीटनाशक) को बताया, जो मधुमक्खियों के कामकाज के लिए घातक होता है। इसके बाद के अध्ययनों ने मधुमक्खियों के गायब होने को सघन कृषि से भी जोड़ा है, जो कम जैव विविधता में योगदान के लिए भी जाना जाता है। भारत में यूरोप या उत्तरी अमेरिका की तरह विशाल पैमाने पर मोनोक्रॉपिंग नहीं हो सकती है, लेकिन फिर भी यहां स्थित कई जगहों पर किसान सघन कृषि का अभ्यास करते हैं। कोलकाता विश्वविद्यालय में प्राणी विज्ञान विभाग के अंतर्गत आने वाले परागण अध्ययन केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक पार्थिव बासु इस बारे में कुछ महत्वपूर्ण बाते बताते हैं। वर्ष 2011 से पार्थिव बासु और उनकी वैज्ञानिकों की टीम स्थानीय क्षेत्र के किसानों के साथ मधुमक्खियों की गिरावट के विभिन्न पहलुओं का दस्तावेजीकरण कर रही है, जिनमें कीटनाशकों के संपर्क में आने से मधुमक्खियों के गायब होने में तेजी देखी गई है। कीटनाशकों की वजह से उनकी उम्र तेजी से कम होती है। वहीं केंद्र के एक अन्य अध्ययन के अनुसार, कम कीटनाशक उपयोग वाली भूमि में मधुमक्खी प्रजातियों की उच्च विविधता थी। एक तीसरे अध्ययन से पता चला है कि कीटनाशकों की वजह से मधुमक्खियों की फूलों या फसलों की गंध सूंघने की क्षमता में गिरावट आती है। इसके अलावा पर्यावरण में बदलाव भी एक वजह रही है। मधुमक्खियों के बिना अधिकांश पौधे विकसित या पुन: उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। बड़े पैमाने पर मरुस्थलीकरण होगा। बड़े पैमाने पर कुपोषण, अकाल, आदि सामने आ सकते हैं। शोध जारी हैं अगर वैज्ञानिक रोबोट मधुमक्खियों के निर्माण में सफल हो गए, तो क्या होगा? सवाल और भी हैं।
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प्रदूषित शहर कीटनाशक भरे खेत जिएं तो कैसे 
मशहूर कीटविज्ञानी मारला स्पिवाक मधुमक्खियों के तेजी से खत्म होने और उनकी हमारी जिंदगी में उपयोगिता पर दुनिया भर में लगातार बात कर रही हैं। कहती हैं, बचनी चाहिए मधुमक्खियां।  "दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से कीटनाशकों का तेजी से इस्तेमाल बढ़ा। हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक शोध से हमें पता चला कि नियोनिकोटिनॉइडस (रासायनिक तौर पर ये निकोटिन के जैसे होते हैं) कीटनाशक असल में मधुमक्खियों के विनाश का कारण हैं। नियोनिकोटिनॉइडस का मधुमक्खियों पर ऐसे असर पड़ता है, मानो अचानक अल्जाइमर हो गया हो। इसी वजह से मधुमक्खियां अचानक अपना छत्ता खाली कर देती हैं और भटकते हुए मर जाती हैं। इसे कॉलोनी कॉलेप्स डिसऑर्डर नाम से जाना जाता है। यहां हमें यह भी ध्यान देना होगा कि कीटनाशक मधुमक्खियों के विनाश का बड़ा कारण हैं, लेकिन इसके अलावा और भी कई कारण हैं, जिनका असर मधुमक्खियों के जीवन पर पड़ रहा है और आखिर में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाला है। 
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मधुमक्खियों के अस्तित्व का एकमात्र मकसद हमारी फसलों का परागण करना नहीं है। असल में मधुमक्खियां हमारी फसलों से अपना खाना हासिल करती हैं और बदले में परागण जैसी बेशकीमती चीज अदा करती हैं। व्यावसायिक नजरिये से देखें तो मधुमक्खियां उन बड़े रईसों की तरह हैं, जो आधा डॉलर के बिल पर 10 डॉलर टिप देते हैं। हमें इसके लिए इनका शुक्रगुजार होना चाहिए।जिसे भी अभी और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ग्रह पर जीवन की फिक्र है, उसे इस खतरे की घंटी को सुनना होगा। मधुमक्खियों की तादाद जितनी कम होगी, फल और सब्जियों की उपलब्धता उतनी की कम होगी और कीमतें उतनी ही ज्यादा। मधुमक्खियां नहीं होने का मतलब है, बादाम, कॉफी, अल्फा-अल्फा, कीवी, सेब, अंगूर, आम, नाशपाती, आडू, स्ट्रॉबेरी, अखरोट, तरबूज जैसा कोई भी फल जो परागण पर निर्भर है, हमें नहीं मिलेगा। अगर हमें अच्छा और साफ सुथरा खाना-पीना चाहिए, तो हमें मधुक्खियों को भी वैसा ही खाना मुहैया कराना होगा। अगर मधुमक्खियों के पास पर्याप्त साफ-सुथरा खाना नहीं होगा, तो जाहिर है, हमारे लिए भी फल और सब्जियों का घाटा होगा। अगर कोई सुन सके, तो मरती हुई मधुमक्खियां यही चीखते हुए मर रही हैं कि इंसानों, तुम्हारे प्रदूषित शहरों और कीटनाशकों से भरे खेतों में मैं अब और नहीं जी सकती।”
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