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कामाख्या मंदिर: जहां विराजित है कृष्ण के पुत्र प्रद्युमन की कुल देवी

सार

कामरु गांव माता कामाख्या के नाम पर स्थित है। यहां प्राचीन क़ालीन लकड़ी हस्तशिल्प का बना हुआ क़िला है जो भगवान श्री कृष्णा के सुपुत्र राजा प्रद्युमन द्वारा बनाया गया है। यह उन्हीं की कुल देवी माता कामाख्या है जिनकी पिंडी स्वरूप स्थापना गुवाहाटी से यहां लाकर स्वयं राजा प्रद्युमन द्वारा किया गया था।

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Kamru fort - फोटो : Social Media Twitter
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विस्तार
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सावन का महीना आरम्भ होते ही एक अलग उत्साह रहता है। भगवान शिव के प्रति और माता भगवती के प्रति और प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक उमंग रहती है कि किसी दिव्य मंदिर या शिवालय जाए या अपने इष्ट के दर्शन करे और दिव्यता की अनुभूति लें। इसी क्रम में हम जा पहुंचे नोएडा से दिल्ली और दिल्ली से कालका रेल्वे स्टेशन। वहां पहुंचकर हमारा अगला पड़ाव रहा कालका शिमला ट्रेन से शिमला पहुंचना। 

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एक यात्रा जो बेहद खूबसूरत रही 

दरअसल, कालका से शिमला की यात्रा ट्रेन से अत्यंत रोमांचक और खूबसूरत है। वादियां, नजारे और बारिश के मौसम में दिखाई देते झरने व हरियाली किसी का भी मन मोह सकते हैं। इन खूबसूरत दृश्य श्रृंखला के बीच से गुजरना एक यादगार सफर रहा। अगले दिन 6 अगस्त को सुबह टैक्सी से शिमला से रकछम गांव पहुंचे जो सांगला से 15 किलोमीटर आगे है। छितकुल रोड पर हमारा कैम्प था। 7 अगस्त को प्रातः रकछम कैम्प से कामरु क़िला और मां कामाख्या दर्शन के लिए निकले।
 

हिमाचल प्रदेश के किनौर ज़िला में सांवला वेली अपनी ख़ूबसूरती के लिए विख्यात है। सांगला की ऊंचाई समुंद्र तल से लगभग 9 हज़ार फ़ीट है। सांगला जाने का प्रयोजन विशेष रूप से वहां स्थित कामरु गांव है जो सांगला से 1500 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है।

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कामरु गांव और माता कामाख्या

कामरु गांव माता कामाख्या के नाम पर स्थित है। यहां प्राचीन क़ालीन लकड़ी हस्तशिल्प का बना हुआ क़िला है जो भगवान श्री कृष्णा के सुपुत्र राजा प्रद्युमन द्वारा बनाया गया है। यह उन्हीं की कुल देवी माता कामाख्या है जिनकी पिंडी स्वरूप स्थापना गुवाहाटी से यहां लाकर स्वयं राजा प्रद्युमन द्वारा की गई थी। कामरु क़िले में इनकी मूर्ति स्थापित की गई है। लेकिन माता कामाख्या का जो वास्तविक मंदिर है वह कामरु गांव से काफ़ी ऊपर लगभग 11500’ फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है।

यहां मंदिर सिर्फ़ रविवार के दिन ही खुलता है और बाहरी लोगों का आना वर्जित है लेकिन माता भगवती की कृपा से रविवार 7 अगस्त को सावन की दशमी तिथि को वहां के स्थानीय निवासी जो की एडवेंचर कैम्प का संचालन करते हैं।

श्री प्रद्युमन सिंह नेगी के सहयोग से ट्रेकिंग आरम्भ किया और लगभग 2.30 घंटे में उस ऊंचाई पर पहुंच गए जहां मां कामाख्या का वास्तविक मंदिर स्थापित है। माता के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ लेकिन इस मंदिर के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है जो कि बहुत दुर्लभ और ऐतिहासिक है। इसका प्रमाण वहां के बुजुर्ग देते हैं और वहां की अति प्राचीन लिपि “टांक्रेय” में समस्त ऐतिहासिक वर्णन अंकित है। उस ऊंचाई से सांगला वेली की ख़ूबसूरती अद्वितीय है।

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