संविधान में मेघालय को स्वायत्तता
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत मेघालय के कुछ आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता दी गई है। इन क्षेत्रों में खासी, जयंतिया और गारो जनजातियों को अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपना स्थानीय कानून बनाने और पालन करने की अनुमति दी गई है।
यहां लोग अपनी परंपराएं और रीति रिवाज को प्राथमिकता देते हैं। वे खुद के बनाए कानूनों का पालन करते हैं। गांवों का प्रशासन मुखिया जैसे "सयेम या नोकमा" द्वारा संचालित होता है। इन समुदायों में मातृसत्तात्मक समाज है, यानी संपत्ति और परिवार की जिम्मेदारी महिलाओं के पास होती है।
मेघालय के इन क्षेत्रों में विवादों और अन्य मुद्दों का निपटारा उनके अपने पारंपरिक अदालतों में होता है। भारतीय न्यायिक प्रणाली केवल कुछ विशेष मामलों में हस्तक्षेप करती है। इससे आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के लिए और बाहरी प्रभाव से बचाव व अपनी स्वायत्तता बनाए रखने का मौका मिलता है।
हालांकि इसका एक नुकसान ये है कि ये क्षेत्र राष्ट्रीय मुख्यधारा से थोड़ा अलग-थलग महसूस करते हैं। वहीं कुछ मामलों में भारतीय कानून और स्थानीय कानून के बीच टकराव हो सकता है।
मलाणा गांव में खुद का संविधान
जहां मेघालय के कुछ क्षेत्रों को संवैधानिक तौर पर स्वायत्ता प्रदान की गई है। वहीं हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में स्थित मलाणा गांव में भारतीय संविधान की बजाए खुद का कानून लागू है। भारत का अंग होने के बाद भी हिमाचल प्रदेश के इस गांव की खुद की न्यायपालिका है। गांव की अपनी संसद है, जिसमें दो सदन है- पहली
ज्योष्ठांग (ऊपरी सदन) और दूसरी
कनिष्ठांग (निचला सदन)।
ज्येष्ठांग में कुल 11 सदस्य होते हैं, इनमें से तीन कारदार, गुरु व पुजारी हैं, जो कि स्थाई सदस्य हैं। बाकि आठ सदस्यों को ग्रामीण मतदान करके चयनित करते हैं।
कनिष्ठांग सदन में गांव के हर घर से एक सदस्य प्रतिनिधि होता है। संसद भवन के तौर पर यहां एक ऐतिहासिक चौपाल है, जहां सारे विवादों के फैसले होते हैं।
मलाणा गांव के नियम
मलाणा गांव के नियम कुछ अजीब हैं। पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र इस स्थान पर बाहर से आने वाले लोग गांव में ठहर नहीं सकते हैं। इसलिए वह गांव के बाहर ही टेंट लगाकर रुकते हैं। एक नियम है कि गांव की दीवार को छूने की मनाही है, ना ही दीवार को पार कर सकता है। अगर वह नियम तोड़ते हैं तो उन्हें जुर्माना देना पड़ सकता है।