गर्मियों के समय रात बारह बजे के बाद कुछ अंधेरा होता है, इसके पहले दस बजे के आसपास तो ऐसा लगता है कि जैसे अभी-अभी शाम हुई है, जबकि ठंड के दिनों में अधिकांश समय अंधेरा होता है। दोपहर में कुछ समय के लिए सूर्य निकलता है। यह सब देखकर बहुत अच्छा लगता है। हालांकि हमारे यहां की तरह वहां के लोग भी छह से सात घंटे ही आधिकारिक रूप से काम करते हैं।
वहां की एक और चीज मुझे बहुत अच्छी लगी कि आपको होटल में रिसेप्शनिस्ट और सिक्योरिटी गार्ड नहीं मिलेंगे। दरवाजे पासवर्ड से खुलते हैं, जो पासवर्ड आपको मिलता है, उसी से सभी दरवाजे खुलते हैं। वहां पर सेल्फ हेल्प फार्मेट है। लोग ज्यादा से ज्यादा काम खुद करना पसंद करते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा अन्य जगहों पर नहीं है, लेकिन फिनलैंड में यह बड़े पैमाने पर है। वहां साफ-सफाई भी बहुत रहती है।
फिनलैंड का वातावरण बहुत अच्छा है। न जाने क्या है, वहां की हवा में जो मुझे आज भी लुभाता है। वहां के लोग बहुत मिलनसार थे, मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मेरे साथ बुरा व्यवहार हुआ है। साथ ही वहां के लोग बहुत ही संतुलित और खुश मिजाज होते हैं, उनसे मिलकर आपको सकारात्मकता का अनुभव होता है। फिनलैंड के लोग हमसे तकनीक के मामले में बहुत आगे हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने इसे दुनिया का सबसे खुशहाल देश भी घोषित किया है।
संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क’ की वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स रिपोर्ट में इसे लगातार दूसरी बार पहला स्थान मिला है। इस यूरोपीय देश में एक इंडियन डांस कम्युनिटी है, जहां हर साल मई महीने में इंडियन डांस फेस्टिवल का आयोजन होता है, जिसमें मुझे अतिथि के रूप में दो बार बुलाया गया है। सचमुच दोनों बार फेस्टिवल में शामिल होकर इतना मजा आया कि शब्दों में बयां नहीं कर सकता। जब आप किसी दूसरे देश में हैं और वहां पर आपके देश की कला को इतना सम्मान और प्यार मिल रहा हो तो अच्छा ही लगता है।
जब मैं पहली बार वहां के डांस फेस्टिवल में शामिल हुआ था तो यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि स्थानीय लोग हिंदी, तमिल और भारत की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के गानों पर इतना बेहतरीन डांस कर रहे थे। सचमुच शानदार अनुभव था। हां, मुझे भारत और फिनलैंड में एक समानता जरूर दिखी कि दोनों ही जगहों पर कला को लेकर लोगों में जागरूकता है। वहां के लोग भी अपनी कला को खूब प्रोत्साहित करते हैं। मैं फिर से फिनलैंड जाने का इंतजार कर रहा हूं।
-सुभाषिनी त्रिपाठी से बातचीत पर आधारित