बिना बहस के दूसरों को कायल बना सकते हैं?
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सवाल का जवाब देने से पहले ही लोगों से कहा गया कि वो अपनी जानकारी की रेटिंग करें। फिर सवाल का जवाब देने के बाद उन्हें अपने जवाब की रेटिंग करने को कहा गया। दोनों में जमीन-आसमान का फर्क़ था। असल जवाब देने से पहले लोगों ने अपने को बड़ा जानकार जाहिर किया। मगर जब उनके जवाब के झोल बताए गए, तो लोगों ने खुद ही अपनी रेटिंग घटा ली।
अक्सर होता यही है। हमें बहुत सी चीजों की जानकारी नहीं होती। या होती है तो बेहद सतही।
मगर हम ख़ुद को उस मामले का बड़ा जानकार समझते हैं। और इसीलिए बहस के दौरान अपनी कमी पर ध्यान देने के बजाय, खुद को काबिल साबित करने में जुट जाते हैं. सामने वाले को धमकाने वाले अंदाज में कहते हैं कि पूरा सच सिर्फ आपको मालूम है। अक्सर हम अपनी जानकारी को खुद ही सच की कसौटी पर नहीं कसते। और, दूसरे लोग हमसे सवाल नहीं करते। इसलिए अपनी जानकारी की कमी का हमें एहसास ही नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक, इस मुगालते को जानकारी की कंजूसी का नाम देते हैं। हम अक्सर ये सोचते हैं कि कोई बात अच्छे से समझने में हम क्यों वक्त बर्बाद करें। जब आधी-अधूरी जानकारी से ही हमारा काम अच्छे से चल रहा है। हम दूसरों पर रौब गांठने में कामयाब हैं। असल में, हम अपनी सतही जानकारी को खुद से ही छुपाते हैं। जिसने भी किसी भी तरह की टीचिंग की है, उसे ये बात अच्छे से पता है। इसका एहसास उसी वक्त से हो जाता है, जब आप कोई विषय पढ़ाने की प्रैक्टिस शुरू करते हैं।
या फिर इस बात की तैयारी करते हैं कि किसी शागिर्द के सवाल का जवाब कैसे देंगे। आपको तुरंत ही एहसास होता है कि आप तो इस मसले को अच्छे से जानते ही नहीं, तो पढ़ाएंगे क्या? बच्चों को समझाएंगे क्या? पूरी दुनिया में अध्यापक ये बात कहते हैं कि जब तक उन्होंने पढ़ाने की शुरुआत नहीं की, उन्हें फलां बात खुद अच्छे से नहीं मालूम थी। पढ़ाने के दौरान ही उन्होंने उस विषय को सही तरीके से समझा। जानकारी की इस कमी को ही एक मौकेमें तब्दील करके, लोगों को अपना कायल बनाया जा सकता है।
बिना बहस के दूसरों को कायल बना सकते हैं?
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इस बात पर अमेरिका के कोलोराडो यूनिवर्सिटी के फिलिप फर्नबैक की टीम ने रिसर्च की थी। फर्नबैक कहते हैं कि चाहे कोई राजनैतिक सिद्धांत हो या टॉयलेट के काम करने का तरीका सब बातों पर ये लागू होगा। अगर हम किसी को ये कहें कि वो अपनी बात दूसरों को समझाने के बजाय, खुद को वही बात समझाएं। तो उसे खुद अपनी बात की कमजोरियों का एहसास होगा। वो दूसरों को कायल बनाने पर जोर देने के बजाय, अपनी बात की कमियों को दूर करने की कोशिश करेगा।
फर्नबैक और उनकी टीम ने इंटरनेट पर अमरीकी लोगों से कई मसलों पर उनकी राय मांगी थी। इन लोगों को दो हिस्सों में बांटा गया था। पहले ग्रुप से कहा गया कि ईरान पर प्रतिबंध लगाने के फैसले, अमरीकी स्वास्थ्य सेवाओं और ग्लोबल वार्मिंग जैसे मसलों पर अपनी राय दें। वो बताएं कि इनसे जुड़े जो फैसले सरकार ने लिए, वो उनका क्यों समर्थन करते हैं। दूसरे ग्रुप से कहा गया कि वो सरकारी फैसलों की जगह जो तरीके खुद बता रहे हैं, उनको सही साबित करने की कोशिश करें, अपने तर्क से। जब इस सर्वे के नतीजे आए, तो वो चौंकाने वाले थे, जिन्होंने सरकारी नीतियों का समर्थन किया था। वो अपनी राय पर कायम रहे। मगर, जिन्हें सरकार के बजाय अपने तर्क रखने थे, वो बदल गए थे। क्योंकि सरकार के फैसले के विरोध में जो वो कह रहे थे, उसके कायल वो खुद नहीं थे। इसलिए जब अपनी बात सही साबित करने की बारी आई, तो वो नाकाम रहे।
तो, आइंदा अपने दोस्तों से किसी बहस में उलझिए तो इस बात का खास खयाल रखिएगा। नए एटमी प्लांट लगाने की बात हो, या पूंजीवाद के पतन का मामला। या फिर आप ये बात सही साबित करना चाहते हों कि दस हजार साल पहले डायनासोर, इंसानों के साथ इसी धरती पर रहते थे। याद रहे, आपको ये समझाना पड़ सकता है कि आखिर, किस बुनियाद पर आप ये बात सही मानते हैं। अगर, आपको अपनी राय पर भरोसा नहीं, तो दूसरे आपकी बात मानें, उससे पहले आपको ही अपनी राय बदलने को तैयार रहना चाहिए।