उस समय सिर्फ तीन साल की थी, जब मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को मनाली के सफर पर लेकर गए थे। उस समय रोहतांग दर्रा जाने का कोई रास्ता नहीं हुआ करता था, तो हम ट्रेक करके पहुंचे थे। इस दौरान वहां ट्रेकिंग का यह मेरा पहला अनुभव था। यहीं से एक पर्वतारोही के रूप में मेरी शुरुआत हुई।
पर्वत मेरे पिता की कमजोरी थे। उन्हें पहाड़ों से प्यार था। जब कभी घूमने का प्लान होता, तो अक्सर हम पहाड़ों की तरफ ही रुख करते। हम लोग सेबों के बाग में एक घर किराए पर ले लेते थे, जहां आमतौर पर मेरे पिता लिखने में व्यस्त रहते और मां चित्रकारी में। इन पहाड़ों और रोहतांग दर्रे ने मुझे भूगोल का व्यवहारिक ज्ञान दिया। छुट्टियों की योजना बनाना मेरे लिए कभी भी मुश्किल काम नहीं रहा। मुझे उन अंदरूनी इलाकों को खोज निकालना पसंद है, जहां आमतौर पर पर्यटक नहीं पहुंच पाते हैं।
वैसे, मुझे क्रॉस कंट्री ड्राइविंग पसंद है, लेकिन पैदल घूमने का अपना ही मजा है। ट्रेकिंग से मुझे पागलपन की हद तक प्यार है और जब मैं यह कर रही होती हूं, तो वास्तव में मैं...मैं होती हूं। मैं इन्हीं चीजों में अपने आप को खोज पाती हूं। सालों से मैं हिमालय क्षेत्र में घूम रही हूं और इसके अंदरूनी इलाकों किन्नौर, लाहौल और स्पीति देख चुकी हूं।