अगर आपका बच्चा अक्सर उदास और मायूस रहता है, तो सावधान हो जाएं। यह अवसाद के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। आधुनिकता के कारण हमारी जीवनशैली में इतना परिवर्तन आया है कि बच्चों में भी अवसाद के लक्षण दिखने लगे हैं। माता-पिता का पर्याप्त समय नहीं मिलने के कारण बच्चे खुद को बहुत अकेला महसूस करते हैं। इसके साथ ही उनके नाजुक कंधों पर हम बचपन से ही जिम्मेदारियों का इतना बोझ डाल देते हैं कि उनका बचपन धीरे-धीरे मरता रहता है।
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बच्चों में डिप्रेशन का मुख्य कारण तनाव या दिमाग में रसायनिक असंतुलन होना है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि छह से 12 वर्ष तक की आयु के तीन प्रतिशत बच्चों में डिप्रेशन की समस्या हो सकती है, लेकिन माता-पिता तथा शिक्षक इसे आसानी से नहीं पहचान पाते। अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर कीथ हर्मन कहते हैं कि जब आप शिक्षकों और माता-पिता को बच्चों में अवसाद का स्तर मापने के लिए कहते हैं तो आम तौर पर उनकी रेटिंग में अंतर होता है। उदाहरण के तौर पर शिक्षक को यह पता हो सकता है कि बच्चे को कक्षा में दोस्त बनाने में परेशानियां आ रही हैं, लेकिन शायद माता-पिता घर में इस बात पर ध्यान न दे सके हों।
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शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए प्राथमिक स्कूल के 643 बच्चों के प्रोफाइल का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि पढ़ाई में 30 प्रतिशत बच्चों में डिप्रेशन का हल्के से ज्यादा अनुभव हुआ, लेकिन माता-पिता और शिक्षक अक्सर बच्चों में अवसाद को पहचानने में विफल हो जाते हैं। हर्मन ने पाया कि जिन बच्चों में अवसाद के संकेत पाए गए, उनमें अपनी उम्र के अन्य बच्चों के मुकाबले कौशल की कमी की छह गुना ज्यादा आशंका होने की बात सामने आई।
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हाल ही में वॉशिंगटन की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कान्सिन-मेडिसन के शोधकर्ताओं ने कहा है कि बच्चों में डिप्रेशन की वजह से उनकी आने वाली जिंदगी भी प्रभावित होती है। जो बच्चे बचपन में ज्यादा डिप्रेशन और टेंशन में रहते हैं, वे बाद में भी पूरी जिंदगी परेशान रहते हैं। आजकल बड़े पैमाने पर तकनीक का इस्तेमाल बच्चे कर रहे हैं। तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता बच्चों के तनाव की बड़ी वजह है। स्कूल में पढ़ाई का ज्यादा दबाव भी बच्चों को डिप्रेशन में डाल रहा है। मां-बाप का दबाव भी बच्चों को तनाव में डालता है। बच्चों पर ज्यादा नंबर लाने का दबाव भी उन्हें डिप्रेशन में लाता है। कभी-कभी माता-पिता अपने सपनों के लिए भी बच्चों पर दबाव डालते हैं। अभिभावक यह सोचते हैं कि बच्चा उनके अधूरे सपनों को पूरा करेगा, जिसके कारण भी बच्चा डिप्रेशन में आता है।
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बच्चों में अवसाद के लक्षण
- चिड़चिड़ापन होना।
-हर समय मायूस और दुखी रहना।
-दोस्तों के बीच भी गुमसुम रहना।
- छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना।
- व्यवहार में अचानक बदलाव आना
- खाने-पीने में ज्यादा आनाकानी करना
- पढ़ाई, खेलकूद में मन न लगना।
- हर समय बेचैन रहना।
-स्कूल से शिकायतें आना।
- हर समय नकारात्मक बातें करना। -अकेलापन पसंद करना। (अगर इनमें से कोई लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा समय से है, तो मनोचिक्तिस्क से संपर्क करें)
अवसाद सिर्फ बड़ों में ही नहीं, बच्चों में भी हो सकता है। अगर बच्चे के व्यवहार में परिवर्तन होने लगे, वह परिवार और दोस्तों से कटने लगे, ज्यादा समय ऑनलाइन बिताने लगे और नकारात्मक बातें करने लगे, तो यह खतरे की घंटी है। यदि बचपन में एडीएचडी, ओसीडी, सीखने की समस्या आदि हो, तो आगे चलकर वह अवसाद का रूप ले लेता है। कई मामलों में यह आनुवांशिक भी होता है। आज के बच्चों में अवसाद होने का एक बड़ा कारण सिंगल फैमिली है। माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पाते, जिससे वह अकेला महसूस करने लगते हैं और तनाव में घिर जाते हैं। बच्चों को दोस्तों के साथ घुलने-मिलने का मौका दें, खेलने-कूदने का मौका दें, उसके साथ समय बिताएं। लैपटाप, मोबाइल आदि की लत न लगने दें। -डॉ. अजय निहलानी मनोचिकित्सक