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आप क्यों इतनी थकान महसूस करते हैं?

Thu, 28 Jul 2016 04:16 PM IST
डेविड रॉबसन/ बीबीसी फ्यूचर
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- फोटो : BBC
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आज अक्सर लोग थके हुए, उदास, निराश नजर आते हैं। बहुत से लोग हैं जो रोजमर्रा के काम करने में ही थक जाते हैं। उनका कुछ करने का ही मन नहीं होता। छोटे-मोटे काम भी थकाऊ और उबाऊ लगते हैं। ऐसा महसूस होता है कि जैसे शरीर में जान ही नहीं। भारीपन महसूस होता रहता है।
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ब्रिटेन की एना कैथरीना शैफ्नर को ही लीजिए। वो हर वक्त थकान महसूस करती थीं। यूं लगता था कि जैसे शरीर में ताकत ही नहीं बची। एना घरेलू काम में ही इतना थक जाती थीं कि उनका दफ्तर का काम निपटाना बहुत भारी पड़ जाता था। मगर एना कहती हैं कि थकान मिटाने के लिए वो जब भी बैठती थीं तो अपना फोन चेक करना नहीं भूलती थीं। जैसे कि उनकी थकान मिटाने का कोई नुस्खा मेल पर आने वाला हो। एना कहती हैं कि उन्हें बेजारी महसूस होती थी। हर उम्मीद से मोह भंग हो गया था।

आज एना जैसी हालत दुनिया में कई लोगों की है। इनमें से कई तो मशहूर शख्सियतें हैं। जैसे कि गायिका मारिया कैरे या फिर पोप बेनेडिक्ट सोलहवें। जिन्हें थकान की ये बीमारी हुई। लोग कहते हैं कि ये बीमारी इसी दौर की पैदाइश है। आज टीवी में ढेरों बहस होती दिखेंगी जो ये बताएंगी कि ये थकान, ये उदासी, हमारे लिए कयामत जैसी है। क्या ये वाकई सच है? या सुस्ती का ये दौर अस्थाई है? इंसान की जिंदगी का एक अटूट हिस्सा है।
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एना शैफ्नर ब्रिटेन की केंट यूनिवर्सिटी में मेडिकल की इतिहासकार हैं। इसीलिए उन्होंने खुद ही इस थकान की जड़ को तलाशने का फैसला किया। इसका नतीजा एक किताब के तौर पर सामने आया। किताब का नाम है-'एग्जॉशन:अ हिस्ट्री' (Exhaustion:A History)। ये किताब बेहद दिलचस्प है। इसमें बताया गया है कि इंसान की थकान, शरीर में ताकत की कमी और दिमागी थकान को डॉक्टरों या मनोवैज्ञानिकों ने किस तरह जाना-समझा है।

इसमें कोई शक नहीं कि आज के दौर में थकान एक गंभीर मसला है। सेहत के मोर्चे पर ये थकान आपके लिए बहुत नुकसानदेह हो सकती है। जर्मनी के डॉक्टरों के बीच हुए एक सर्वे के मुताबिक करीब पचास फीसद डॉक्टर थका हुआ महसूस करते हैं। इनमें से कई लोग हर वक्त थका, बेजार महसूस करते हैं। काम में उनका जरा भी मन नहीं लगता। काम का ख्याल आते ही शरीर की ताकत खत्म हुई सी मालूम होती है। मगर एक सर्वे के मुताबिक औरते और मर्द थकान से अलग-अलग तरह से निपटने हैं।

क्यों होती है थकान?

- फोटो : BBC
आदमी इस वजह से ज्यादा लंबी छुट्टियां लेते हैं। उनके मुकाबले महिलाएं, थकान की हालत से निपटने के लिए कम छुट्टियां लेती हैं। एना शैफ्नर कहती हैं कि काम न करने की हालत को लोग अलग-अलग तरह से लेते हैं। कुछ लोग इसे रईसाना परेशानी बताते हैं। एक जर्मन अखबार के मुताबिक अमीर लोगों ने अवसाद या डिप्रेशन को नया नाम दे दिया है। जब वो काम नहीं करना चाहते, तो उसे बर्नआउट का नाम दे देते हैं। कामयाब लोग खुद को डिप्रेशन के शिकार नहीं बताना चाहते हैं। वो इसके लिए बर्नआउट शब्द इस्तेमाल करते हैं। वहीं जो लोग नाकाम होते हैं, उन्हें अवसाद का शिकार बता दिया जाता है।

हालांकि जानकार कहते हैं कि अवसाद और थकान, दो एकदम अलग चीजें हैं। डिप्रेशन में लोग आत्मविश्वास गंवा देते हैं। या फिर वो खुद से ही नफरत करने लगते हैं। वहीं थकान के शिकार लोगों के साथ ऐसा नहीं है। खुद के बारे में उनकी राय वही रहती है। एना शैफ्नर कहती हैं कि थकान के दौरान गुस्सा, असल में अपने काम के माहौल के खिलाफ बगावत है। एना कहती हैं कि बर्नआउट और फैटीग यानी ऊंचे दर्जे की थकान में फर्क होता है। फैटीग में लंबे वक्त तक लोगों का काम करने का मन नहीं होता।

कुछ लोग कहते हैं कि आधुनिक सभ्यता का माहौल ऐसा है, जिसमें काम करने के लिए इंसान का दिमाग तैयार नहीं है। लोगों पर ज्यादा से ज्यादा काम करने, नए-नए लक्ष्य हासिल करने का दबाव रहता है। बहुत से लोगों को ये भी साबित करना होता है कि उन्हें जो काम दिया गया है, वो इसके काबिल हैं।

यानी आप रोज एक जद्दोजहद में जीते हैं। रोज आप पर काम का, कुछ बेहतर करने का दबाव होता है। इससे तनाव होता है। और, तनाव से थकान। बहुत से लोगों के लिए तो काम के अलावा घर के हालात का दबाव भी होता है। दिमाग में हर वक्त कोई न कोई चुनौती सवार रहती है। जिंदगी का पहिया रुकता ही नहीं। उसे आराम का मौका नहीं मिलता। आराम न मिलने से हमारा दिमाग ताजगी नहीं महसूस करता। तो हमारे दिमाग की बत्ती नहीं जलती। हमारे शरीर को चलाने वाली बैटरी कभी पूरी तरह से रिचार्ज नहीं हो पाती।

हालांकि एना ने जब थकान का इतिहास खंगाला तो पता चला कि इंसान पुराने दौर में भी इस बीमारी का सामना करते थे। इसका सबसे शुरुआती जिक्र रोमन डॉक्टर गैलेन का किया हुआ मिलता है। ग्रीक डॉक्टर हिप्पोक्रेट्स और गैलेन, दोनों को ये लगता था कि दिमागी और बदन की बीमारियों की जड, खून में, पित्त में और कफ में तलाशी जा सकती है। शरीर में काले रंग के पित्त का इकट्ठा होना इस बात का सुबूत माना जाता था कि दिमाग की नसों का रास्ता बंद हो गया है

क्या है थकान की असली वजह

- फोटो : BBC
वो तकलीफ में है। दिमाग को थकान हो रही है। हालांकि आज इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता। मगर, फिर भी थकान महसूस करने वाले अक्सर दिमाग में भारीपन की शिकायत करते हैं। जब यूरोप में ईसाई धर्म अपनी जड़ें जमा रहा था, उस दौर में थकान की शिकायत करने वालों में रूहानी ताकत की कमी बतायी जाती थी। ऐसा माना जाता था कि वो धर्म से विमुख है। उस दौर के एक पादरी ने एवाग्रियस पोंटिकस ने लिखा है कि उसे दोपहर के वक्त पिशाच दिखाई देते थे।

जिसके बाद वो बस यूं ही खिड़की के पास बैठे रहते थे। उनका कुछ करने का मन नहीं होता। पादरी के मुताबिक ये उनके अंदर धार्मिक आस्था और आत्मविश्वास की कमी का प्रतीक था। एक और पादरी का किस्सा भी है कि वो साथियों के साथ बोलने बतियाने में ही मशगूल रहता था। काम करने का उसका मन ही नहीं होता था। एना इसे आज के दौर के उन लोगों जैसा बताती हैं, जो थका हुआ महसूस करते हैं मगर हर वक्त मोबाइल पर लगे रहते हैं।

आज की तारीख में डॉक्टर इसे 'न्यूरास्थेनिया' नाम की बीमारी बताते हैं। उनके मुताबिक दिमाग से इलेक्ट्रिक संकेत शरीर के दूसरे हिस्सों को जाते हैं। जिसकी नसें कमजोर होती हैं, उसके बदन को संकेत नहीं जा पाते। और उसका काम करने का मन नहीं होता। बहुत से मशहूर लोग जैसे, ऑस्कर वाइल्ड, चार्ल्स डार्विन, थॉमन मैन और वर्जिनिया वूल्फ तक 'न्यूरास्थेनिया' के शिकार थे। डॉक्टर कहते हैं कि ये लोग यूरोप की औद्योगिक क्रांति की वजह से समाज में आए बदलाव के शिकार हुए थे।

उनकी नाजुक नसें उनकी बुद्धिमानी की गवाही देती थीं। वैसे तो बहुत कम देशों में 'न्यूरास्थेनिया' को बीमारी की मान्यता मिली है। मगर चीन और जापान में डॉक्टर इसका खूब इस्तेमाल करते हैं। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि ये डिप्रेशन का दूसरा नाम है। साफ है कि सदियों से लोग काम से थकान, माहौल से ऊब जाना और बेजारी महसूस करते रहे हैं। इंसान के विकास के अलग-अलग दौर में इसकी वजहें भले अलग रही हों। मगर थकान हमारे रहन-सहन का अटूट हिस्सा रही है।

मध्य युग में ये दोपहर के वक्त का पिशाच थी। तो बीसवीं सदी में ये पूंजीवाद के विकास के साथ लोगों के शोषण की वजह होती थी। सच तो ये है कि हम आज भी पूरी तरह से नहीं समझते कि थकान, शरीर में ताकत की कमी की असल वजह क्या है। और कई बार ये अचानक से खत्म कैसे हो जाती है। हमें ये भी नहीं पता कि इसके लक्षण शरीर में पहले दिखाई देते हैं। या फिर दिमाग इसकी गवाही पहले देता है। हमें ये भी नहीं मालूम कि थकान समाज के माहौल की वजह से होती है या फिर हमारे खुद के बर्ताव का नतीजा है।
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यूं कम करें थकान

- फोटो : BBC
शायद थकान का सच इन सबको मिलाकर बनता है। हमारे एहसास, हमारा भरोसा हमारे ऊपर गहरा असर डालते हैं। हमें मालूम है कि जज्बाती तकलीफ से अपने भीतर जलन और दर्द महसूस होता है। कई बार तो इसकी वजह से दौरे भी पड़ने लगते हैं। थकान के चलते आंखों के आगे अंधेरा सा छा जाता है। एना शैफ्नर कहती हैं कि किसी भी बीमारी के बारे में पक्के तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि ये दिमागी है या शारीरिक। या फिर दोनों का मिला जुला नतीजा है।

हां, थकान कई बार हम पर इतनी भारी पड़ती है कि शरीर सुन्न हो जाता है। अब ये आपका ख्याल भी हो सकता है और सच्चाई भी। एना के मुताबिक आज ज्यादा लोगों को थकान हो रही है। इसका साफ मतलब है कि ये मसला हमारी जीवन शैली का है। काम के ज्यादा मौके मिलने की वजह से लोग अपनी क्षमता से ज्यादा काम कर रहे हैं। उनके काम का दायरा बढ गया है।

फिर काम से तनाव होता है। तनाव से थकान और शरीर में ताकत की कमी महसूस होने लगती है। एना ये भी मानती हैं कि बार-बार मेल चेक करना, हमेशा सोशल मीडिया पर स्टेटस अपडेट करना भी हमें थकाता है। एना के मुताबिक, नई तकनीकों की वजह से जिंदगी आसान हुई है तो उनकी वजह से कई मुसीबतें भी आई हैं। आज अपने दफ्तर का बोझ लोग दिमाग पर लादकर घर पहुंचते हैं। वहां मेल चेक करके खुद को उस बोझ की याद दिलाते रहते हैं। ऐसे में थकान तो होगी ही।

थकान और बेजारी का कोई ठोस इलाज भी नहीं। कुछ लोग मनोवैज्ञानिकों की मदद लेते हैं। कुछ लोग छुट्टियां लेकर थकान उतारते हैं। वहीं कुछ लोग परिवार-दोस्तों-रिश्तेदारों के साथ वक्त बिताकर, थकान से मुक्ति पाते हैं। एना कहती हैं कि आपको पता होना चाहिए कि आपको किस चीज से थकान होती है और किस काम से हौसला मिलता है। खुशी मिलती है। कुछ लोग खेल-कूदकर थकान उतार लेते हैं। हां, एक बात तय है। हमें काम और आराम के बीच एक लाइन खींचनी होगी।

इस बारे में तमाम रिसर्च से खुद एना को भी अपनी परेशानी समझने और उससे निपटने में मदद मिली है। यानी थकान की हर इंसान में अलग वजह है। हां, इस बीमारी के आप अकेले मरीज नहीं। मगर, इससे निपटने का तरीका आपका अपना जरूर हो सकता है।
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