आज के तेज रफ्तार दौर में चाहे जिले की कमान संभाल रहे प्रशासनिक अधिकारी (IAS/IPS) हों या कॉरपोरेट बोर्डरूम में बैठे शीर्ष अधिकारी, सभी एक जैसे संकट से जूझ रहे हैं, निर्णय लेने का दबाव, काम का तनाव और लगातार बढ़ता वर्कलोड। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि सफलता के लिए सिर्फ तेज दिमाग या बुद्धिमत्ता काफी है, लेकिन अब यह भ्रम टूट रहा है।
कॉरपोरेट और प्रशासनिक जीवन में एसक्यू के सीधे फायदे
संकट में मानसिक स्थिरता (समत्व)
प्रशासनिक अधिकारियों को जनहित और राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन साधना पड़ता है, वहीं कॉरपोरेट अधिकारियों पर तिमाही नतीजों का भारी दबाव रहता है। ऐसी स्थिति में अहंकार या भय से मुक्त रहने के लिए आध्यात्मिक स्थिरता जरूरी है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 48) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
(भावार्थ: हे अर्जुन, आसक्ति छोड़कर और सफलता-असफलता में समान भाव रखकर अपने कर्तव्य कर्म करो। यह समत्व भाव ही ‘योग’ कहलाता है।)
यह समत्व भाव नेतृत्वकर्ता को शांत रखकर दूरगामी और निष्पक्ष निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
बेहतर कार्यक्षमता और उत्पादकता
आध्यात्मिकता काम से पलायन नहीं सिखाती, बल्कि प्रदर्शन को धार देती है। जब मन नतीजों की अनावश्यक चिंता या ऑफिस पॉलिटिक्स में नहीं उलझता, तो ऊर्जा सीधे काम की गुणवत्ता पर केंद्रित होती है। गीता का सूत्र है - ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ (कर्म में कुशलता ही योग है)।
स्वस्थ कार्य-संस्कृति और संतुलन
दफ्तरों में तनाव अक्सर असुरक्षा की भावना और श्रेय लेने की होड़ से पैदा होता है। एसक्यू नेतृत्व को पद की धौंस से हटाकर साझी जिम्मेदारी की ओर ले जाता है। इससे आंतरिक खींचतान घटती है, मानसिक शांति मिलती है और अनिद्रा, ब्लड प्रेशर जैसी तनावजनित बीमारियों से बचाव होता है।
अहंकार की समस्या: विचार से ठोस समाधान की ओर
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में हम अक्सर यह पढ़ते हैं कि 'व्यक्ति का अहंकार ही सारे दुखों और विवादों की जड़ है।' बौद्धिक रूप से यह बात हर कोई जानता है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘इस अहंकार को असल में कम कैसे किया जाए?’ इस पर ठोस और व्यावहारिक समाधान देने वाले लोग बेहद कम हैं।
क्या व्यक्ति के स्वभावदोष दूर हो सकते है?
इस दिशा में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के संस्थापक और अंतरराष्ट्रीय सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले ने गहन वैज्ञानिक शोध प्रस्तुत किया है। उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति की ‘स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया’ (Personality Defect Removal - PDR) विकसित की है।
यह प्रक्रिया सीधे श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय (दैवासुरसंपद्विभागयोग) से जुड़ी है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने 'दैवी संपदा' (सद्गुण) और 'आसुरी संपदा' (दोष, षड्रिपु और अहंकार) का स्पष्ट अंतर समझाया है। डॉ. आठवले ने इसे केवल दर्शन तक सीमित न रखकर एक व्यावहारिक रूप दिया है, जिससे व्यक्ति अपने अंतर्मन में दर्ज संस्कारों को पहचानकर उन्हें दूर कर सके।
पीडीआर का निरंतर अभ्यास तनाव को जड़ से समाप्त कर कार्यकुशलता बढ़ाता है और व्यक्ति को चिरंतन आनंद (परम सत्य) की अनुभूति कराता है। आज देश-विदेश में कई वरिष्ठ अधिकारी और व्यावसायिक संस्थान इस पद्धति का लाभ उठाकर अपने व्यक्तिगत जीवन और कार्यशैली में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं।
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