नवरात्रि की पूजा परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वच्छता, संयम, सेवा और श्रद्धा को भी महत्व दिया जाता है। अष्टमी या नवमी के दिन कई घरों में कन्या पूजन किया जाता है, जिसमें छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर भोजन कराया जाता है और उन्हें उपहार या दक्षिणा दी जाती है।
2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक चलेगी और 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। आइए जानते हैं नौ दिनों में मां के किन स्वरूपों की पूजा होती है और कलश स्थापना से कन्या पूजन तक पूरी परंपरा क्या है।
कलश स्थापना से शुरू होती है नवरात्रि पूजा
नवरात्रि के पहले दिन घर के पूजा स्थान की साफ-सफाई करके कलश स्थापित किया जाता है। इसे घटस्थापना भी कहा जाता है। सामान्य रूप से कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखा जाता है। कई परंपराओं में कलश के नीचे मिट्टी में जौ बोने की परंपरा भी है।
कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा और अखंड ज्योति जलाने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है। कलश स्थापना का सही समय स्थानीय पंचांग और स्थान के अनुसार देखना चाहिए।
- पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा
नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। भक्त मां को फूल, फल, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करते हैं। इस दिन से कई लोग नौ दिनों के व्रत की शुरुआत भी करते हैं।
- दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता में की पूजा की जाती है। भक्त मां को फल, मिठाई और अन्य सात्विक भोग अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर इस दिन विशेष उनका स्वरूप तप और साधना का प्रतीक माना जाता है। भक्त पूजा के साथ मां की आरती और मंत्र जाप करते हैं।
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। उनका स्वरूप शक्ति और साहस से जुड़ा माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से मां को फूल और भोग अर्पित करके आरती की जाती है।
चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। भक्त मां को फल, मिठाई और अन्य सात्विक भोग अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर इस दिन विशेष धार्मिक आयोजन भी होते हैं।
- पांचवां दिन: मां स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। भक्त परिवार की सुख-शांति और मंगल की कामना के साथ मां की आराधना करते हैं।
छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। मंदिरों और घरों में विशेष आरती और भोग की परंपरा रहती है। इस दिन भी व्रत रखने वाले भक्त सात्विक आहार लेते हैं।
- सातवां दिन: मां कालरात्रि
सातवें दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा होती है। धार्मिक परंपरा में मां को शक्ति और नकारात्मकता के नाश से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन विशेष पूजा और आरती की जाती है।
- आठवां दिन: मां महागौरी और कन्या पूजन
अष्टमी को मां महागौरी की पूजा की जाती है। कई परिवारों में इसी दिन कन्या पूजन किया जाता है। छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनके पैर धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा दी जाती है।
हालांकि कुछ परिवार और परंपराएं नवमी के दिन कन्या पूजन करती हैं, इसलिए इसमें स्थानीय परंपरा और परिवार की मान्यता का पालन किया जाता है।
- नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री
नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। कई जगह इस दिन नवमी हवन, विशेष आरती और कन्या पूजन किया जाता है। इसके बाद नवरात्रि व्रत का पारण किया जाता है।
कन्या पूजन में किन बातों का रखें ध्यान?
कन्या पूजन में छोटी बच्चियों को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। कई परिवारों में एक बालक को भी भैरव स्वरूप मानकर भोजन कराने की परंपरा है। भोजन में पूरी, हलवा और चने जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। इसके बाद कन्याओं को फल, मिठाई, वस्त्र, स्टेशनरी या दक्षिणा दी जा सकती है।
कन्या पूजन की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है। इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय मान्यताओं का पालन करना उचित है।
नवरात्रि पूजा का समापन
नवमी या दशमी के अवसर पर कई घरों में हवन और विशेष पूजा के बाद नवरात्रि का समापन किया जाता है। इसके बाद दशमी को विजयादशमी मनाई जाती है। नवरात्रि के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा, स्वच्छता, संयम और अपनी परंपरा के अनुसार पूजा करना है।