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30 साल बाद फिर उठाया ब्रश, बेटी की एक बात ने मां को लौटा दिया उनके अधूरे सपनों तक

Tue, 29 Sep 2026 05:31 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अपने जन्मदिन पर बेटी ने मां से एक पेंटिंग खरीद देने का आग्रह किया। पेंटिंग महंगी थी। लगभग 30 साल पहले चित्रकला को छोड़ चुकी मां के लिए उस पेंटिंग को खरीद पाना संभव नहीं हो पाया। बेटी ने जिद की, “आप मेरे लिए उससे भी सुंदर चित्र बना दीजिए।” मां ने फिर से ब्रश उठाया।  चित्रकार सीमा भार्गव की यह कला यात्रा इस विश्वास की कहानी है कि सपने कभी बूढ़े नहीं होते, वे केवल सही समय की प्रतीक्षा करते हैं।
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30 साल बाद फिर मां ने बेटी के लिए शुरू की पेटिंग - फोटो : AI
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विस्तार
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दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो अपने अधूरे सपनों का दोष नियति, समय या उम्र के माथे मढ़ देते हैं। वे मान लेते हैं कि कुछ रास्ते एक बार छूट जाएं तो फिर लौटकर नहीं आते। लेकिन कुछ विरले लोग ऐसे भी होते हैं, जो समय को पराजित नहीं करते, बल्कि उसे अपने पक्ष में साध लेते हैं।

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चित्रकार सीमा भार्गव की कहानी

जालंधर में जन्मीं और अब नोएडा में रहने वाली चित्रकार सीमा भार्गव ऐसी ही विरली कलाकार हैं। सीमा भार्गव मात्र एक वर्ष की आयु में अपनी बुआ के साथ दिल्ली आ गईं। उन्होंने दिल्ली में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और बाद में ‘कॉलेज ऑफ आर्ट’ से चित्रकला में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

उनके भीतर छिपे कलाकार को आकार देने में तीन महान गुरुओं की निर्णायक भूमिका रही- राजेश मेहरा, मनजीत बावा और बिमान दास। कॉलेज ऑफ आर्ट में प्रोफेसर राजेश मेहरा ने सबसे पहले उनकी प्रतिभा को पहचानकर उसे दिशा दी। उनसे सीमा ने संरचना, संतुलन और अनुशासन सीखा। आगे चलकर मनजीत बावा ने उन्हें रूप, रिक्तता और रेखा के सौंदर्य का बोध कराया, जबकि बिमान दास ने यह विश्वास दिया कि रंग केवल दृश्य नहीं रचते, वे भावनाओं की अपनी स्वतंत्र भाषा भी बोलते हैं।

पति के निधन के बाद कंधों पर आया बोझ

इन तीनों गुरुओं की सीख ने सीमा भार्गव को तकनीकी दक्षता के साथ रचनात्मक निर्भीकता भी प्रदान की। लेकिन जीवन हमेशा कलाकार की योजना के अनुसार नहीं चलता। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके जीवन में ऐसा वज्रपात हुआ, जिसने सब कुछ बदल दिया। उनकी छोटी-सी बेटी चलना ही सीख रही थी कि पति का असमय निधन हो गया। अचानक पूरे परिवार का भार उनके कंधों पर आ गया। उस कठिन समय में उन्होंने अपने सबसे प्रिय साथी- ब्रश और कैनवास को चुपचाप एक ओर रख दिया।

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तीस वर्ष बेटी को समर्पित

इसके बाद लगभग तीन दशक तक उनका पूरा जीवन केवल एक उद्देश्य के इर्द-गिर्द घूमता रहा- बेटी स्मिता का भविष्य। उन्होंने अपने हर सपने को बेटी के सपनों में बदल दिया। वही बेटी आगे चलकर, कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त कर देश के सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता बनी, लेकिन साल 2013 में इस कहानी ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया।

स्मिता जानती थी कि उसकी मां ने उसके भविष्य के लिए अपनी कला का त्याग किया है। अपने जन्मदिन पर उसने मां से कहा कि उसे आर्ट गैलरी में प्रदर्शित एक विशेष पेंटिंग उपहार में चाहिए। सीमा जब वह चित्र खरीदने पहुंचीं तो उसकी कीमत उनकी पहुंच से कहीं अधिक निकली। निराश होकर वह घर लौटीं और बेटी से असमर्थता व्यक्त कर दी।

बेटी ने मांगी मां से पेटिंग 

दरअसल, स्मिता इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी। उसने चुपचाप मां के सामने कैनवास, रंग और ब्रश रख दिए और मुस्कुराकर कहा, “यदि वह चित्र इतना महंगा है तो आप मेरे लिए उससे भी सुंदर चित्र बना दीजिए।”

यह केवल एक बेटी का आग्रह नहीं था, एक कलाकार को उसके अपने संसार में वापस बुलाने का निमंत्रण था। तीस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सीमा भार्गव ने फिर ब्रश उठाया। एक बार रंगों से संवाद शुरू हुआ तो फिर कभी नहीं रुका। आज उनकी कला यात्रा निरंतर आगे बढ़ रही है। वर्ष 2023 में मुंबई की प्रतिष्ठित जहांगीर आर्ट गैलरी में उनकी एकल प्रदर्शनी आयोजित हुई। इसके अलावा वह देश की अनेक महत्वपूर्ण सामूहिक प्रदर्शनियों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।

कला और कैनवास उनका अदम्य विश्वास

सीमा भार्गव मुख्यतः बड़े आकार के कैनवास पर तैलचित्र रचती हैं। विशाल कैनवास उनके लिए केवल आकार का चुनाव नहीं, बल्कि एक सौंदर्य-दृष्टि है। उनका मानना है कि बड़ा कैनवास दर्शक को चित्र के बाहर खड़े रहने के बजाय उसके भीतर प्रवेश करने का अवसर देता है। लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के शांत पर्वत, बौद्ध मठ, गहरी घाटियां और वहां का निसर्ग उनकी चित्रभाषा के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

पेनवर्क में भी उनकी दक्षता उल्लेखनीय है। सीमा भार्गव की कला यात्रा केवल एक चित्रकार की वापसी की कहानी नहीं है, यह उस अदम्य विश्वास का दस्तावेज है कि जीवन चाहे जितनी देर तक किसी कलाकार के हाथों से ब्रश छीन ले, यदि भीतर सृजन की लौ जीवित है तो एक दिन रंग फिर लौटते हैं।

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