Pareting Tips: 80-90 के दशक के बच्चे दादी-नानी की कहानियां सुनकर, दादा-नाना के लाड़ और अनुशासन के बीच पले बढ़े हैं। लेकिन अब नई पीढ़ी यानी अल्फा और जेन बीटा इस तरह की परवरिश से दूर होती जा रही है। एकल परिवारों के चलन ने बच्चों को उनके नानी-दादी से दूर कर दिया है।
हालांकि आज के माता पिता बच्चों की परवरिश को लेकर अधिक सतर्क और सक्रिय होते हैं। उनकी नीयत सही रहती है, परवरिश में भरपूर मेहनत करते हैं लेकिन फिर भी कुछ खालीपन रह जाता है। वजह साफ है कि कुछ सबक पढ़ाए नहीं जाते, बल्कि जीकर सिखाए जाते हैं और यही काम सदियों से दादा-दादी करते आए हैं। बच्चे को अच्छे और महंगे स्कूल में भेजना माता पिता का प्रयास होता है लेकिन दादी-नानी अपने आप में स्कूल होते हैं, वह पाठ्यक्रम नहीं, अनुभवों की क्लास देते हैं।
एकल परिवार सुविधा तो देते हैं लेकिन संस्कार नहीं देते हैं। वह बच्चे के बाल्यकाल में उसे भरपूर समय देते हैं। अच्छी तरह से उसकी निगरानी करते हैं, रामायण-महाभारत की कथा सुनाकर अच्छी सीख देते हैं और बच्चे को दूसरों की परवाह करना, दया भाव सिखाते हैं। जो माता पिता के लिए संभव नहीं, क्योंकि वह इतना सारा वक्त चाहकर भी बच्चे को दे नहीं पाते। आइए जानते हैं कि माता-पिता के प्रयास के बाद भी वो कौन सी कमियां हैं जो परवरिश में रह जाती हैं, जिसे सिर्फ दादा-दादी या नाना नानी ही पूरी कर सकते हैं।
धैर्य का पाठ
व्यस्त जीवनशैली में माता-पिता के पास समय की कमी होती है। वह दफ्तर, मीटिंग, होमवर्क, ट्यूशन आदि सबकुछ मैनेज करते हैं। हर चीज के लिए उन्हें वक्त निकालना पड़ता है। लेकिन दादा दादी समय के साथ चलते हैं। उनके पास अपने पोते-पोतियों के लिए काफी वक्त होता है। बहुत कम ही उनके मुख से
अभी नहीं, ठहरो, मैं बिजी हूं। जैसी बातें सुनी जाती हैं। बच्चे उनके साथ बैठकर सीखते हैं कि हर जवाब तुरंत नहीं आता, हर इच्छा तत्काल पूरी नहीं होती। व्यस्तता के कारण उनके पास इतना धैर्य नहीं होता तो बच्चा भी धैर्य नहीं सीख पाता। लेकिन बुजुर्ग अपना धैर्यपूर्ण व्यवहार बच्चों तक पहुंचाते हैं।
बिना शर्त अपनापन
माता-पिता का प्यार ज़िम्मेदारियों से घिरा होता है। वह सही-गलत, नंबर और नियम कायदों के बीच बच्चे का पालन करते हैं। लेकिन दादा-दादी का प्यार बिना ग्रेडिंग का होता है। दादा दादी गलतियों पर डांटते कम है, बल्कि लाड प्यार से समझाते हैं। यही लाड बच्चों को वह भावनात्मक सुरक्षा देता है, जहां से आत्मविश्वास जन्म लेता है। वह दबाव महसूस नहीं करते और भावनात्मक तौर पर दादा-दादी से ज्यादा करीब महसूस करते हैं।
परिवार में पहचान
दादा-दादी कहानी नहीं सुनाते, वंशावली सौंपते हैं। उनके परिवार ने कितना संघर्ष किया, त्याग और जीत-हार के किस्से सुनाकर बच्चों को बताते हैं कि वे किस मिट्टी से बने हैं। आधुनिक शिक्षा कौशल देती है, पर पहचान नहीं। चुपचाप रात की कहानियों में पहचान दादा दादी देते हैं। बच्चा जब अपने परिवार के इतिहास और मेहनत को समझता है तो वह इसकी कद्र करता है। साथ ही अपने रिश्तेदारों का भी सम्मान करना सीखता है।
संस्कार बनाम निर्देश
माता-पिता समझाते हैं, क्या सही है और क्या गलत। दादा-दादी कैसे जिया जाता है, ये बच्चे को दिखाते हैं। पड़ोसी की मदद, बड़ों का मान, भोजन का सम्मान ये किसी पाठ की तरह रटाया नहीं जा सकता है। बल्कि दिनचर्या में शामिल करके उसके जीवन में उतारा जाता है। बच्चे वहीं सीखते हैं जो वह रोज देखते हैं।
भाषा, बोली और जड़ें
दादा-दादी के साथ बोली जिंदा रहती है। त्योहार का सही अर्थ समझ पाते हैं, रिवाज समझते हैं। यह सब बच्चों को ग्लोबल बनाते हुए जड़ों से जुड़ा रखते हैं। जड़ें मज़बूत हों तो उड़ानें ऊंची होती हैं।
स्क्रीन से दूरी
माता-पिता अपने बच्चों को दिन का पूरा वक्त नहीं दे पाते। इसलिए बच्चे मोबाइल, लैपटाॅप या टीवी स्क्रीन में अपना ज्यादा वक्त बिताते हैं। स्क्रीन टाइम बच्चे के मस्तिष्क विकास में बाधक है, साथ ही वह अपने तक सीमित हो जाता है। दादा-दादी के साथ बच्चा खेलता है, कहानी सुनता है, संवाद करता और सीखता है। ये कौशल सक्रीन टाइम में उसे नहीं मिलता है। वह दादा-दादी की आंखों की भाषा को भी समझता है।
अनुशासन पर नरमी से
माता-पिता का अनुशासन लक्ष्य-केन्द्रित होता है। माता-पिता बच्चे को अनुशासित रखने के लिए स्ट्रिक्ट भी हो जाते हैं लेकिन दादा-दादी का अनुशासन रिश्ता-केन्द्रित होता है। ऐसे में बच्चे नियम मानते हैं, पर टूटते नहीं। वे समझते हैं कि गलती में सुधार हो सकता है।