पर इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं थी। मां ने बताया था ऐसा ही होता है। वहां तक भी ठीक था। फिर पहली बेटी हुई...फिर पहली मारपीट...फिर उसने पहली बार शराब पी...फिर बिस्तर में सारा गुस्सा निकला...फिर दूसरी बेटी हुई...फिर उसने काम छोड़ दिया....फिर मैंने काम करना शुरू किया....फिर तीसरी बेटी हुई।
मुझसे मारपीट, मेरे कमाए पैसों से शराब और बिस्तर में शैतान की तरह मेरे ही शरीर का इस्तेमाल, सब जारी रहा। पर मैं चुप रही। औरत के साथ ये सब होता है। मां ने बताया था। चौथी बार जब मैं पेट से थी तो 20 की हो गई थी। अधमरे से मेरे शरीर को जब मैडम (जिनके घर मैं काम करती थी) ने फिर फूलते देखा तो नाराज़ हो गईं। पूछा, पैदा कर पाओगी?
इतना ख़ून भी है शरीर में? मैंने कहा, हो जाएगा। सोचा बड़े घर की ये औरत क्या समझेगी मेरी ज़िंदगी को। बेटा पैदा होने तक मुझे ये सब झेलना ही था। बैंक में पैसे जमा करने की सलाह और मदद एक बात थी पर घर-परिवार की ये बारीक़ी नहीं समझा सकती थी उन्हें...मन करता था कि सब चुपचाप हो जाए. किसी को पता ना चले कि मैं पेट से हूं, मेरा शरीर ना बदले, मेरी ज़िंदगी की कहानी भरे चौराहे पर ना ला दे। मुझे यक़ीन था कि बेटा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। मारपीट, शराब, बिस्तर का वो मनहूस सिलसिला टूट जाएगा और इस बार बेटा ही हुआ!
अस्पताल में जब नर्स ने आकर ये बताया तो मैं रोने लगी। बच्चा पैदा करने के लिए 10 घंटे से सहा दर्द और नौ महीने तक कमज़ोर शरीर में पालने की थकान मानो एक पल में ग़ायब हो गई। पर फिर... फिर कुछ नहीं बदला... वो मनहूस सिलसिला जारी रहा। अब मेरी क्या ग़लती थी? अब तो मैंने बेटा भी पैदा कर दिया था। पर मेरे पति को शायद शैतान बनने की आदत पड़ गई थी।
मेरा शरीर बहुत टूट गया था।फिर से पेट से ना हो जाऊं, ये ख़ौफ़ हर व़क्त सताता रहता था। एक दिन मेरी मैडम ने मेरा बेजान चेहरा देख मुझसे पूछा, एक चीज़ बदलनी हो तो क्या बदलोगी अपनी ज़िंदगी में... मैं हंस दी. अपनी चाहत के बारे में ना मैंने कभी सोचा था ना किसी ने कभी पूछा था। पर बात हंसी में टाली नहीं... ख़ूब सोचा.... एक हफ़्ते बाद मैडम से कहा कि मेरा जवाब तैयार है... वो तो तब तक भूल भी गई थीं शायद...मैंने कहा कि मैं फिर मां नहीं बनना चाहती, पर अपने पति को कैसे रोकूं ये नहीं जानती। मैंने समझाने की कोशिश की थी।
चार बच्चों को खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं, ये भी कहा था. पर बिस्तर उससे नहीं छूटता। मेरे कमज़ोर शरीर की परवाह नहीं और बच्चों की ज़िम्मेदारी जब कभी ली ही नहीं तो उससे क्या डर। तब मैडम ने कहा, नसबंदी का ऑपरेशन करवा लो. ये तुम्हारे हाथ में है. तुम उसे रात में चाहे ना रोक पाओ, कम से कम गर्भवती होने से तो खुद को बचा लोगी।
मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता था। कई दिन बीत गए... मेरे बहुत से सवाल थे। जब मैडम जवाब देते-देते थक गईं तो एक क्लीनिक का पता दिया। वहां मेरे जैसी और औरतें थीं। उन्हीं से पता चला कि नसबंदी का ऑपरेशन जल्दी से हो तो जाता है पर कुछ गड़बड़ हो जाए तो जान भी जा सकती है।
महीनों की उधेड़बुन के बाद जब पति और बच्चों से झूठ बोलकर अकेले क्लीनिक आई तो भी दिमाग़ में बस यही डर छाया हुआ था...पर मैं थक गई थी। डर भी था और हताशा भी। ये करना ख़तरनाक था पर उम्मीद थी कि कम से कम इसके बाद मेरी ज़िंदगी का एक सिरा तो मेरे क़ाबू में होनेवाला था।
फिर मेरा ऑपरेशन हुआ और मैं मरी नहीं। कुछ दिन लगे, कमज़ोरी रही, दर्द रहा पर अब सब ठीक है। 10 साल हो गए हैं। अब 32 की हो गई हूं। मैं फिर कभी मां नहीं बनी। मेरे पति को कुछ अजीब भी नहीं लगा। उसकी ज़िंदगी अब भी नशे, मारपीट और बिस्तर के बीच आराम से कट रही है। शायद उसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता और मैं... मैं भी वही कर रही हूं जो मुझे करना है।
मैडमों के घरों में सफ़ाई-बरतन, जिससे मिलनेवाले पैसों से बच्चे बड़े हो रहे हैं। पति को नहीं छोड़ सकती... मां ने कहा था... ना उसकी आदत बदल सकती हूं इसलिए उसकी आदत डाल ली है मैंने। बाक़ि सुकून है, कि उसने नहीं रखा तो क्या, अपना थोड़ा ख़्याल मैंने रख लिया। मेरा ऑपरेशन मेरा राज़ है. फख्र है। एक फैसला तो था जो मैंने सिर्फ़ अपने लिए किया।