फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kanyadaan: देवी पूजने वाली संस्कृति में बेटी का दान क्यों? जानिए हिंदू विवाह में कन्यादान का अर्थ और महत्व

Tue, 09 Dec 2025 11:52 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

`Kanyadaan Meaning: लोग बिना रीति रिवाजों का सही अर्थ और महत्व जाने, उसे पिछड़ी सोच या रूढ़ीवादी परंपरा का हिस्सा बताकर नकार देते हैं। शादी में कन्यादान की परंपरा का भी सही अर्थ लोगों को पता नहीं है। आइए जानते हैं क्यों कन्यादान किया जाता है।
विज्ञापन
कन्यादान का सही मतलब और महत्व - फोटो : Adobe Stock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Kanyadaan in Hindu Wedding: हिंदू विवाह सिर्फ दो लोगों के बीच का बंधन नहीं, बल्कि दो वंशों, संस्कृतियों, संस्कारों और परिवारों के मिलन का मौका है। हिंदू शादियों में कई रीति रिवाज होते हैं, जिनका सही अर्थ जाने बिना ही लोग इसे अपना लेते हैं, तो कुछ गलत मतलब निकालकर अलोचना करते हैं। शादी की इन्हीं परंपराओं में से एक कन्यादान है। 

विज्ञापन


आज के दौर में कन्यादान को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। कई कपल इसे महिला के लिए अपमानजनक मानकर कन्यादान को शादी संस्कार से बाहर कर देते हैं। आधुनिक विचारों के लोगों का मानना है कि कन्यादान पिछड़ी सोच का प्रतीक है। इसमें महिलाओं को वस्तु मानकर उसका दान कर दिया जाता है, जो कि गलत है। लेकिन क्या वास्तव में वेदों में भी कन्यादान का यही अर्थ बताया गया था? आइए जानते हैं हिंदू विवाह में कन्यादान का सही अर्थ और महत्व।

 
देवी की भूमि में बेटी को वस्तु कैसे मान सकते हैं?

यह वही संस्कृति है जहां नारी को ‘शक्ति’ और ‘जननी’ कहा जाता है। भारत में सीता, दुर्गा और सरस्वती माता की पूजा होती है। हमारे देश में स्वयंवर का रिवाज हुआ करता था, जिसमें दुल्हन खुद अपना साथी चुनती थीं। जब पौराणिक दौर से ही महिलाओं को ही इतनी आजादी दी गई थी, तो फिर विवाह संस्कार के दौरान बेटा का दान कैसे किया जा सकता है? सच यह है कि कन्यादान का अर्थ “बेटी खो देना” नहीं बल्कि उसे नए आध्यात्मिक कुल से जोड़ना है। कन्यादान का सही अर्थ बेटी का दान नहीं, सम्मान करना है। 
विज्ञापन



कन्यादान का असली भाव

‘दान’ शब्द यहां स्वामित्व नहीं बल्कि संस्कारिक परिवर्तन दर्शाता है। इस प्रक्रिया में दुल्हन अपने मायके के गोत्र से पति के गोत्र में प्रवेश करती है। यह मान्यता इस वैज्ञानिक समझ से भी जुड़ी है कि आने वाली संतानें पैतृक वंश को आगे बढ़ाती हैं। इसलिए गोत्र परिवर्तन को आध्यात्मिक स्वीकृति का रूप दिया गया। कन्यादान नारी का वस्तुकरण नहीं, उसकी नई पहचान और नई यात्रा का उत्सव है।


चयन का अधिकार 

हालांकि अगर लोग शादी में कन्यादान को अपनाना नहीं चाहते हैं उनको हिंदू विवाह में चयन का अधिकार मिलता है। बिना कन्यादान भी विवाह पूरी तरह से वैध और पूर्ण माना जाता है। कई मातृसत्तात्मक समुदायों में यह अनुष्ठान होता ही नहीं, फिर भी विवाह आध्यात्मिक रूप से सही माने जाते हैं।

आलोचना से पहले समझना जरूरी

किसी रस्म को बदलना हो तो बदलिए, पर पहले उसे समझिए। क्योंकि बिना जड़ों को जाने पेड़ को काटना सिर्फ मूर्खता है। कन्यादान ऐसा संस्कार है जो बेटी को ‘किसी का बोझ’ नहीं, दो परिवारों का गर्व बनाता है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें