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#HerChoice: इसलिए मैंने कुंवारी मां बनने का फैसला लिया

Sat, 29 Dec 2018 08:48 AM IST
मोना नारंग बीबीसी हिंदी
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जब प्यार हुआ तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि वो ना मेरे देश का था, ना मेरे मजहब का, ना मेरी जाति का। पर अब हमारे लिव-इन रिलेशनशिप को टूटे एक महीना ही हुआ था और मैं उसके बच्चे की मां बननेवाली थी। मेरे सारे दोस्तों को लग रहा था कि मैं पागल हो गई हूं क्योंकि मैं, 21 साल की कुंवारी लड़की, ये बच्चा रखना चाहती थी। मुझे भी ऐसा ही लग रहा था कि मैं पागल हो जाऊंगी। मन ऐसा घबरा रहा था जैसे कुछ बहुत बुरा होने वाला है। पर जो बुरा होना था वो तो हो चुका था। मैं 19 साल की थी जब मुस्तफा से मिली।

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उत्तर-पूर्व के अपने छोटे से शहर को छोड़कर मैंने देश के दूसरे सिरे में एक बड़े शहर में कॉल सेंटर में नौकरी करनी शुरू ही की थी। मुस्तफा अफ्रीकी मूल का था। वो 'टॉल, डार्क ऐंड हैंडसम' वाली कैटिगरी में फिट बैठता था। उसमें 'स्वैग' था। मेरा जवां दिल उसकी तरफ खिंचा चला गया। एक-डेढ़ साल की दोस्ती और के बाद हमने साथ रहना शुरू कर दिया।

- फोटो : मैं क्रिश्चियन हूं और वो मुसलमान
मैं क्रिश्चियन हूं और वो मुसलमान। हमें एक दूसरे से प्यार भी था लेकिन शादी की बात सोचने की हिम्मत दोनों में ही नहीं थी। हम सपनों की उस दुनिया में जी रहे थे जहां आगे की जिंदगी के बारे में कुछ भी सोचना बेमानी सा लगता है। उसके बहुत से दोस्त थे जो हमेशा हमारे घर आया करते थे। मैं भी उनसे खुलकर हंसती-बोलती थी।

पता नहीं क्यों, मुस्तफा के मन में शक घर करने लगा। उसे लगता था कि मेरा उसके दोस्तों के साथ अफेयर है और इस बात को लेकर हमारी लड़ाइयां होने लगीं। धीरे-धीरे ये इतनी कड़वीं हो गईं कि हमारे दिन एक दूसरे पर चीखते-चिल्लाते बीतने लगे। आखिर हमने ब्रेकअप कर लिया। मैं बहुत दुखी रहने लगी, घंटों रोती रहती और इसका असर मेरे काम पर भी पड़ने लगा। मेरी नौकरी छूट गई। 

वापस घर जाने का इरादा

मैंने तय किया कि वापस घर जाऊंगी। अपने इस छोटे से अपार्टमेंट और उसके साथ जुड़े अनुभवों से दूर जाना चाहती थी, लेकिन मेरी सारी प्लानिंग फेल हो गई जब उस महीने मेरे पीरियड्स नहीं आए। पास की एक दुकान से 'प्रेगनेंसी टेस्टिंग किट' लेकर आई तो मेरा डर सही साबित हुआ। रिजल्ट 'पॉजिटिव' था। मुस्तफा के साथ रहने के बाद ये दूसरी बार था कि मैं प्रेगनेंट हुई थी। पहली बार उसके दबाव में मैंने अबॉर्शन करवा दिया था। पर इस बार...

मैंने मुस्तफा को फोन कर एक कैफे में बुलाया। आमने-सामने बैठ जब उसे बताया तो मुझ पर ही चिल्लाने लगा, कि मैंने सावधानी क्यों नहीं बरती। उसने मुझे सैकड़ों वजहें गिनाई और बच्चा गिराने के लिए मनाने की कोशिश की। ये तक कह डाला कि वो यकीन कैसे कर ले कि बच्चा उसी का है, लेकिन मैंने जिद पकड़ ली थी। जब पहला बच्चा गिराया था तो लगा था कि जैसे मैंने किसी का खून किया है। दोबारा अपने ही बच्चे का खून करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। ऐसा नहीं कि मुझे डर नहीं लग रहा था। मेरे तो आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

मैं शादीशुदा नहीं थी और न ही मेरे पास कोई अच्छी नौकरी थी। बच्चे का बाप तो उसे अपना मानने को तैयार तक नहीं था, लेकिन साथ ही ऐसा भी लग रहा था कि भगवान शायद मुझे मौका दे रहा है एक नई जिंदगी शुरू करने का। अब तक मैं एक लापरवाह युवा की जिंदगी जी रही थी, सबको शक था कि मैं एक बच्चे को नहीं पाल पाऊंगी। मुझे भी मालूम था कि मेरा रास्ता आसान नहीं है पर अब मेरे पास जिम्मेदार होने की एक वजह थी। मेरे अजन्मे बच्चे का प्यार मुझे उसे इस दुनिया में लाने को कह रहा था।

मैंने डरते-डरते अपने परिवार को इस बारे में बताया। उन्हें मुस्तफा के बारे में पहले से पता था, लेकिन मेरी प्रेगनेंसी की बात सुनकर वो बहुत गुस्सा हुए। वो इस बात से उतने नाराज नहीं थे कि मैं शादी से पहले मां बनने जा रही हूं, बल्कि इससे कि वो बच्चा एक काले, विदेशी और उनकी जाति के बाहर के लड़के का था। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि मैं सब कुछ खुद संभाल लूंगी। उन्होंने भी दोबारा मदद के लिए नहीं पूछा। इस मुश्किल वक्त में मेरी एक दोस्त ने बहुत मदद की। उसी की स्कूटी चलाकर मैं मेडिकल चेकअप के लिए डॉक्टर के पास जाया करती थी।

- फोटो : सेल्स गर्ल की नौकरी
अपना खर्च चलाने के लिए मैंने एक दुकान में सेल्स गर्ल का काम करना शुरू किया। इस बीच, मुस्तफा ने मुझे मनाने की कोशिशें जारी रखीं पर मेरा फैसला पक्का था। डिलिवरी वाले दिन मेरी दोस्त मुझे स्कूटी पर बैठाकर हॉस्पिटल ले गई। एक घंटे बाद सिजेरियन ऑपरेशन से मेरे बच्चे का जन्म हुआ। जब मुझे होश आया तो बच्चा मेरी दोस्त की गोद में था और डॉक्टर मेरे पास खड़ी मुस्कुरा रही थीं। मैं बहुत खुश थी। लग रहा था सब ठीक होने वाला है।

शाम को मुस्तफा भी हॉस्पिटल आया। उसने बच्चे को गोद में उठाया और अपने दोस्तों को फोन करके बताया कि वो एक बेटे का पिता बन चुका है। मुस्तफा को इतना खुश देख मैं हैरान रह गई। पर वो अब भी अपने परिवार को इस बारे में बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। उसने दोबारा रिश्ता शुरू करने की बात कही। वो बच्चे को मुस्लिम नाम भी देना चाहता था, लेकिन मैंने इनकार कर दिया और अपने बच्चे को क्रिश्चियन नाम दिया।

मैं मुस्तफा पर भरोसा नहीं कर पा रही थी। कुछ दिनों बाद मेरी मां और कजिन भी मेरे पास आ गए। अब मैं अकेली नहीं थी। अगले साल मुस्तफा भारत से अपने देश लौट गया और फिर मेरी जिंदगी में कभी वापस नहीं आया। अब मैं 29 साल की हूं और मेरा बेटा छह साल का होने जा रहा है। ये व़क्त बहुत मुश्किल था पर उसे बड़ा करते-करते मैं और निडर हो गई हूं।
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मैं लोगों को बेझिझक बताती हूं कि मेरी शादी नहीं हुई और मेरा एक बेटा है। उससे भी कहती हूं कि अगर कोई उसके पापा का नाम पूछे तो वो मुस्तफा बताए। मुझे अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है। मैं खुश हूं। मेरा बेटा अब मेरी मां के घर में रहता है क्योंकि मैं यहां अपना करियर बना रही हूं। अब पार्टियों और इवेंट्स में गाना गाती हूं। पैसे जमा कर अपने बेटे का भविष्य सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही हूं। वो बहुत ही प्यारा बच्चा है।

मुस्तफा के साथ मेरा रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो गया लेकिन ये हमेशा खास रहेगा। इस रिश्ते से मैंने जीना सीखा है। मैं सब कुछ भुलाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हूं। मैं दोबारा प्यार करना चाहती हूं। शादी भी, लेकिन जल्दबाजी नहीं है। किस्मत में होगा, तो ये भी हो जाएगा।
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