मुझे रातों-रात घर खाली करना पड़ा
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रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे और मकान मालिक शराब पीकर कमरे में आ धमका। चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ और आंखें नशे में लाल थी। उसने मुझे फौरन कमरा छोड़ने का फरमान सुना दिया। वह गंदी-गंदी गालियां दे रहा था और मेरे सामान पर लात मारे जा रहा था। महीना पूरा होने में अभी 10 दिन बचे थे और किराया एडंवास जा चुका था। मैं अंकल जी, अंकल जी कहे जा रहा था और उनकी जुंबान से मां बहन की गालियां निकल रही थी।
एक बारगी मेरा भी हाथ उठने ही वाला था लेकिन सामने जब पिता की उम्र का व्यक्ति हो तो आंखों में शर्मिंदगी आ ही जाती है। मैं चुपचाप सुनते रहा और अपना सामान समेटने में लग गया। कुछ देर बाद देखा तो आंटी, और उनका बेटा भी आ धमका और मकान खाली करने के लिए कहने लगे। मैंने आंटी को समझाया कि, रात में, मैं कहां जाऊंगा?
अभी 10 दिन बचे हैं। किराया तो पूरा दिया ही है। यह सुनकर उनका लड़का झल्ला गया और अपनी मां को पीछे कर आगे आ धमका। वह लड़ाई की फिराक में था। मैंने उससे विनती कि- 'मैं दूसरे शहर का हूं। यहां रहकर पढ़ाई कर रहा हूं, रात में कहा जाऊंगा?'। लेकिन वह नहीं माना और उल्टा मुझसे ही बोलने लगा- ज्यादा चौड़ा मत हो और कमरा खाली कर। अजीब स्थिति थी। आधा-घंटा बीत चुका था और आसपड़ोस से भी इक्का-दुक्का लोग आकर मुझसे ही कहने लगे कि मैं कमरा खाली क्यों नहीं कर देता?
मुझे अंदर से रोना आ रहा था और बाहर से मैं हिम्मती दिखना चाहता था। कमरे के बाहर अब तक लोगों की भीड़ लग चुकी थी और एक दो बुजुर्ग आकर मुझे समझाने लगे कि मैं अपने किसी दोस्त के यहां क्यों नहीं चला जाता? जिसका मकान है, अगर वह खाली करने के लिए कह रहा है तो मुझे कमरा खाली कर देना चाहिए।
मकान मालिक और किरायेदार
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दिल्ली में यह मेरा पहला अनुभव था और यहां आए हुए मुझे सिर्फ छह महीने ही हुए थे। घर 160-170 किलोमीटर दूर था और मैं खानपुर में अपने सामान के साथ भीतर से गुस्से से भरा हुआ था। रात के डेढ़ बज रहे थे। किसे फोन किया जाए? मेरे भीतर यही चल रहा था। ग्रेजुएशन के बाद पिताजी ने बाहर पढ़ने के लिए एक साल से बोल रखा था। बचपन से ही बड़े शहर का आसमां आकर्षित करता था। और आखिरकार इसी बड़े शहर में, मैं सामान के साथ सड़क पर था। जिस बड़े शहर का आसमां अच्छा लगता था वो ही आज निगलने को आ रहा था।
मंगलवार का दिन था और मैं हनुमान जी से पूछ रहा था- किसे फोन करूं, छह महीने में किसी से ऐसी दोस्ती तो हुई नहीं जो सामान के साथ ही मुझे अपने यहां बुला ले। कॉलेज में होता तो काफी दोस्त होते मैं तो एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर हार्डवेयर का कोर्स कर रहा था और बहुत ज्यादा दोस्त भी नहीं बने थे।
साल 2014 का वह दिन मुझे आज भी याद है। अब भी किराये के कमरे में ही रहता हूं, लेकिन ये लोग बहुत अच्छे हैं। परिवार की तरह माहौल है। मैं बिजनौर का रहने वाला हूं। रात के दो बज रहे थे और मैंने अपने साथ पढ़ने वाले वसीम को फोन मिलाया। रात में उसने फोन नहीं उठाया। सामान ज्यादा नहीं था, लेकिन पौथली कई हो गई थी और एक कूलर भी था जो मुझे किसी भार से कम नहीं लग रहा था।
मैंने पूरी रात वहीं बिता दी और सुबह वसीम का फोन आया तो उसे पूरी कहानी सुना डाली। वसीम का कालकाजी में अपना घर था। सुबह वह और उसका छोटा भाई मुझे लेने आ गए। मुझे खुद ही यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि वसीम से मेरी ज्यादा बातचीत नहीं थी, पता नहीं मैंने उसे ही क्यों फोन मिलाया ? इस बात को मैं आज तक नहीं समझ पाया। वसीम के घर वाले भी यह सुनकर हैरान थे और मैं तो खैर था ही।
दूसरे ही दिन वसीम ने मुझे कालकाजी में घर दिलवा दिया और तब से मैं यही रह रहा हूं। मुझे आज तक नहीं समझ आता कि अंकल ने मुझसे रातों-रात घर खाली क्यों करवाया? इस घटना से दो दिन पहले वो मेरे पास आए थे और 1000 रुपए किराया बढ़ाने के लिए कह रहे थे। मैंने उनसे बस यही कहा था कि मैं इतना किराया नहीं भर सकता, अगले महीने कमरा खाली कर दूंगा? हंसते हुए- अगर मुझे पता होता यह बात उनको इतनी बुरी लगेगी तो मैं ऐसा क्यों कहता? खैर, ऐसा नहीं है कि हर मकान मालिक बुरा ही होता है। दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों किस्म के लोग होते हैं।
( गौरव (बदला हुआ नाम) कालकाजी में रहते हैं और एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं।)