पचास साल गुज़र जाने के बाद भी सफ़ेद जोड़े और पाश्चात्य संगीत के अलावा दक्षिण कोरिया में शादियों को लेकर बनी धारणाओं जैसे परिवार और आर्थिक मज़बूती की ख्वाहिशों में कोई बदलाव नहीं आया है।
इतना ज़रूर है कि शादी पर आने वाला ख़र्च बदल गया है। टेसंस के माता-पिता की शादी उनके गांव में पड़ोसियों की मदद से हुई थी लेकिन उनकी शादी और एक साधारण से घर को ख़रीदने में एक करोड़ रुपए से ऊपर का ख़र्च आया है।
टेसंस कहती हैं, "शादी हमारे लिए बहुत ही तनावपूर्ण साबित हुई है। एक पारंपरिक कोरियाई शादी में इतनी सारी बातों का ख़्याल रखना पड़ता है जबकि आधुनिक शादियों में हमें बहुत ख़र्च करना पड़ता है। शादियां इतनी ज़्यादा व्यावसायिक हो गई हैं।"
ये कहना मुश्किल है कि ये दबाव आख़िर आ कहां से रहा है। शायद समाज की तरफ़ से। दशकों के मज़बूत आर्थिक विकास के बाद दक्षिण कोरियाई लोगों के ख़र्च की आदतों में भी बदलाव आया है।
लोग अब बचत के बजाए ज़्यादा खर्च कर रहे हैं और उधार लेने में भी आगे हैं।
आर्थिक मंदी
यहां घरेलू कर्ज़ का प्रतिशत अमरीका से भी कहीं ज़्यादा है। हालांकि विश्व भर में छाए आर्थिक संकट ने दोबारा सोचने पर मजबूर किया है।
दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में पिछले 100 सालों से मौजूद कबाड़ी बाज़ार के ख़रीददार भी कुछ बदले हुए से हैं।
यहां के दुकानदार महसूस कर रहे हैं कि उनकी दुकानों में अब अच्छी ख़ासी हैसियत रखने वालों की आमद बढ़ी है।
कबाड़ी बाज़ार के एक दुकानदार का कहना है, "ये अजीब ही है कि वैश्विक संकट के बाद हमारे यहां कारोबार पहले से बेहतर हो रहा है।"
इस बदलाव को समझाते हुए मार्केट कम्यूनिकेशन मैनेजर पाक जैंग हो कहते हैं, "मेरे ख़्याल से लोग मोल-भाव करना चाहते हैं। इस्तेमाल की हुई चीज़ें ख़रीद कर पैसे बचाना चाहते हैं। शायद इसलिए ये बेहतर विकल्प है। आप देखते हैं कि बंधी तन्ख़्वाह पर काम करने वाले ज़्यादा से ज़्यादा कामगार यहां आने लगे हैं। एक सस्ती औऱ बेहतर डील की तलाश में।"
आर्थिक मंदी और न्यूनतम कल्याणकारी व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिए कर्ज़ लेना ही जीवन जीने का एक ज़रिया है।
इस साल की शुरूआत में दक्षिण कोरिया कR नए राष्ट्रपति ने एक राष्ट्रीय ख़ुशहाली फंड की घोषणा की जिसका मकसद देश के सबसे ग़रीब लोगों के लगभग आधे कर्ज़ माफ़ करना है। जिसके चलते कर्ज़ माफ़ी की लाख़ों अर्ज़िया आ चुकी हैं।
कर्ज की समस्या
मेरी मुलाक़ात 50 साल के पाक जौंग ह्यन से हुई।
वे कहते हैं, "आमदनी कम और ख़र्च ज़्यादा, ये यहां लोगों के लिए आम बात है। जब अर्थव्यवस्था बेहतर थी तो थोड़ा बहुत कर्ज़ लेने में कोई हर्ज नहीं था। मेरे पास तो अलग-अलग कामों के लिए 10 क्रेडिट कार्ड थे जिनसे मेरे घर, दफ्तर और बड़ी ख़रीद पर हुआ ख़र्च चलता था। फिर आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और मेरा क़र्ज़ पिछले कुछ सालों से बचा हुआ है। मैं आज यहां आया हूं ताकि कर्ज़ माफ़ करा सकूं और उन्होंने मेरा 50 फ़ीसदी कर्ज़ माफ़ भी कर दिया है।"
हालांकि इस योजना के आलोचक कहते हैं कि इससे दक्षिण कोरिया की कर्ज़ की समस्या हल नहीं होगी बल्कि डिफॉल्टर यानी कर्ज़ ना चुका पाने वालों की संख्या ही बढ़ेगी।
लोगों की आमदनी, ख़र्च और आर्थिक हालात को समझने के लिए मैं एक कोरियाई जोड़े की शादी में शरीक हुई।
यहां पाकातेसुन्स की शादी की दूसरी रस्म शुरू होने को थी। पश्चिमी कपड़ों की जगह भव्य परंपरागत कोरियाई कपड़ों को चुना गया और कोरियाई रस्में निभाई जाने लगी।
आम तौर पर कोरिया में शादियां, घर की ख़रीद और पढ़ाई के ख़र्च माता-पिता की आमदनी से हुई बचत से ही पूरे किए जाते हैं।
लेकिन ख़राब आर्थिक सेहत और बढ़ते क़र्ज़ के बीच माता पिता के लिए इस सवाल का जवाब ढूंढना मुश्किल हो गया है कि उनके बच्चों के लिए ये ख़र्च पूरा कर पाना कैसे मुमकिन होगा।