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मां कहती हैं: खुद से प्रेम करना तभी दूसरों से प्रेम कर पाओगी,  मेरी बच्ची 

Tue, 05 Feb 2019 01:07 PM IST
ललित फुलारा ललित फुलारा
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जब तक इंसान को खुद से प्रेम नहीं होता वो दूसरे से भी प्रेम नहीं कर सकता। - फोटो : रोहित झा
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प्यारी बेटी,

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                मैं तुम्हारी मां हूं। अकेले में तुम मेरी बातों को याद करती होगी। सलाहों पर गौर करती होगी।  दुख, सुख और विपत्ति में हर वक्त तुम्हारे भीतर 'आह' भरता होगा मां...  'मम्मा'। ऐसे वक्त में जब हम प्रेम नहीं, पर्सनैलिटी पैकेजिंग का लेनदेन कर रहे हैं; मैं तुमसे मुखातिब हो रही हूं। तुम्हें प्रेम का सच्चा मतलब समझाने जा रही हूं।

मेरी बातों पर गौर करना...मेरी बेटी

जब तुम बच्ची थी, तुम्हें हर चीज से प्रेम था। खुद से प्रेम था। दूसरों से प्रेम था। क्या अब भी ऐसा ही है? अगर मशीनी हो चुके वक्त में खुद के प्रति तुम्हारा प्रेम कम हो गया है तो मेरी बच्ची सबसे पहले खुद से लिपट जाए, अथाह प्रेम को भर लो खुद के भीतर। बचपन में हो आओ। जब तक इंसान को खुद से प्रेम नहीं होता वो दूसरे से भी प्रेम नहीं कर सकता। यह तुम्हारी मम्मा की पहली सीख है। इसे आत्म प्रेम कहते हैं मेरी बच्ची। यह प्रेम तुम्हें, सफलता देगा और सत्यनिष्ठ बनाएगा।

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जब हम खुद को प्रेम करवाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो समस्याएं खड़ी होती हैं
जब हम खुद को प्रेम करवाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो समस्याएं खड़ी होती हैं
मेरी बच्ची, तुम जीवन में इस बात को लेकर खुश रहना कि तुम किसी से प्रेम करती हो। जो प्रेम करता है उसके अंदर प्रेम करने की क्षमता होती है। अपने भीतर यह भाव बिल्कुल न लाना कि कोई 'मुझसे प्रेम करे...'। हम सोचते हैं कि प्रेम का मतलब है- कोई हमसे प्रेम करे। जबकि, असल अर्थ है- हम प्रेम करें। जब हम खुद को प्रेम करवाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो समस्याएं खड़ी होती हैं। हम खुद को अयोग्य समझकर, योग्य बनाने में सारी मेहनत लगा देते हैं। ऐसे में कई रास्ते चुनते हैं। और प्रेम का अर्थ खो देते हैं। मेरी बच्ची, प्रेम पाने की दिशा में आगे मत भागना। बस प्रेम करना।

प्रेम हमारे भीतर सक्रिय शक्ति है जो हमें दूसरों से जोड़ता है 
प्रेम हमारे भीतर सक्रिय शक्ति है जो हमें दूसरों से जोड़ता है 
मेरी बच्ची प्रेम में न सैडिस्ट बनना और न ही मेजोकिस्ट। क्योंकि प्रेम हमारे भीतर एक ऐसी सक्रिय शक्ति है जो हमें  दूसरों से जोड़ती है। हमारे अकेलेपन और विलगाव की भावना को दूर करती है। ऐसे में तुम प्रेम में न ही मैजोकिस्ट बनना और न ही सैडिस्ट। मेरी बच्ची ,यह थोड़ा मनोवैज्ञानिक है लेकिन, तुम्हारा मम्मा इसे तुम्हें समझाने की कोशिश कर रही है।

हम जब प्रेम में किसी के प्रति मैजोकिस्ट बन जाते हैं तो उसका हिस्सा बनने के साथ ही उसी से कंट्रोल भी होने लगते हैं। अकेलेपन और विलगाव (सेपरेशन) से बचने के लिए किसी व्यक्ति का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में हमारी आत्मनिर्भरता खो जाती है। निर्णय लेने की क्षमता हमारे भीतर से चली जाती है। हम खुद को दूसरे हवाले कर देते हैं, प्रेम में यह बेहद घातक है। 
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न ही सेडिस्ट बनना मेरी बच्ची। यह प्रवृत्ति हमें प्रेम में प्रताड़ित, शोषित और अपमानित करने की दिशा में आगे ले जाती है। इसमें भी हम दूसरे पर उतने ही निर्भर हो जाते हैं और उन्हें खुद का इस कदर हिस्सा बना लेते हैं कि प्रेम का वास्तविक अर्थ ही खो जाता है।

अगली बार तुम्हारी मां तुमसे फिर मिलेगी

 
नोट: यह कॉलम अमर उजाला की ओर से मां द्वारा अपने  बच्चों के साथ परवरिश संवाद के रूप में तैयार किया गया है। इस कॉलम में बच्चों के लालन-पालन से लेकर उनकी परवरिश से जुड़े सवालों और बच्चों के मन में रहने वाली छोटी-छोटी दुविधाओं को प्रश्न-उत्तर के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया गया है।

    
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