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'लेडी चैटर्ली का प्रेमी' की एक दास्तां

Tue, 23 Dec 2014 11:05 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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यह अंश 'लेडी चैटर्ली का प्रेमी' उपन्यास से लिया गया है। 'लेडी चैटर्ली का प्रेमी' पुरुष की छांह के लिए धूप में तपती एक औरत की कहानी है, जिसे दुनिया के लगभग सभी देशों में अश्लील करार दिया गया, पर जिसका एक-एक शब्द सत्य है, यथार्थ से ओत-प्रोत है। पांच साल तक मुकदमा चलने के बाद भारत सरकार ने इसे अश्लीलता के आरोपों से बरी कर दिया।
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अब तक मैलर्स परे हट गया था। कठघरे पर झुकी हुई कोनी के शरीर की साटन में कसी हुई पिछली उठान ने उसे जगा दिया था। बहुत दिनों बाद उसकी नसों में सालों से सोई हुई आग धीरे-धीरे सिर उठा रही थी। उसने सोचा था कि लहू की गर्मी मरने से वह शरीर की कैद से छूट गया है। इस वक्त भी, नसों की आग जाग जाने पर भी, वह पीछे लौट जाना चाहता था। लेकिन आग थी कि भड़कती जा रही थी। मद्धम-मद्धम, धीरे-धीरे, घुटनों से ऊपर रेंगती हुई।

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मैलर्स कोनी को देखने के लिए मुड़ा। कोनी चूजे को दड़बे में टिका देने के लिए हाथ आगे बढ़ाकर कठघरे पर झुकी हुई थी पर आंखों में भरे आंसुओं के धुंधलके में सब कुछ गड्ड-मड्ड हो जाने से चूजे को ठीक-ठाक उतार न पा रही थी।
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कोनी का अकेलापन और विवशता मैलर्स को छू गए। वह अनजाने उसकी ओर बढ़ा और चूजे को उसकी हथेली से उतार कर दड़बे में रखने के बाद उसकी ओर देखने लगा। आग घुटनों से होकर धक्-धक् जलती हुई सारी धमनियों में फैल गई थी। कोनी दोनों हाथों से चेहका ढंके हुए हिचकियां ले रही थी और इधर मैलर्स को लग रहा था कि वह पिघल रहा है और अगले ही कुछ क्षणों में यदि उसने कुछ न किया तो वह निरर्थक पिघल जाएगा।

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'रोने की क्या बात है? रोना नहीं चाहिए'। - उसने नर्मी से कहा और कोनी के कंधे पर हाथ रख दिया। धीरे-धीरे थपथपाता हुआ उसका हाथ नीचे उतरने लगा। स्वभावतः किंतु विवश।

'अंदर चलो' उसने भावहीन स्वर में कहा और कोनी को एक बांह से थामकर अंदर झोपड़ी में ले गया। वे दोनों जब तक अंदर नहीं आ गए, उसने आपना हाथ कोनी के कंधे पर से नहीं हटाया। फिर वह कुर्सी और मेज हटाकर जमीन पर एक कंबल बिछाने लगा। कोनी ने कनखियों से उसके चेहरे की तरफ देखा, लेकिन वहां कोई भाव न था। केवल आतुरता थी। परिस्थितियों के समक्ष समर्पित हो जाने की विवश आतुरता।

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'लेट जाओ'  उसने आहिस्ता से कहा और दरवाजा बंद कर दिया। कमरे में पूरी तरह अंधेरा था।

अवश कोनी कंबल पर लेट गई। मुग्घ किंतु निसहाय कामना का एक स्पर्श उसके चेहरे को छूने के बाद कंधों पर रेंगता हुआ नीचे उतरने लगा। फिर मैलर्स ने उसे चूमा और आहिस्ता-आहिस्ता उसके गालों पर थपकियां देने लगा।

वह मुग्ध, किसी स्वप्न में लिपटी हुई सी पड़ी रही। जब मैलर्स हिचकिचाता हुए हाथ से उसके वस्त्रों की सतहें पलटने लगा तो वह एक बार हल्के से कुछ कुनमुनाई, पर उसके बाद शांत हो गई। मैलर्स ने धीरे-धीरे पहले सिल्कन गाउन उतारा, पीछे पांवों तक और तब आगे कुछ करने से पहले एक क्षण ठिठका। मानो प्रतीक्षा कर रहा हो स्वीकृति की, समर्पण की।

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इस दौरान कोनी एक गहरी नींद में बेसुध प़ड़ी रही, आक्रामक रोल मैलर्स का ही रहा। वह केवल स्वीकार कर रही थी, किंतु इस स्वीकृति में सहयोग था, विरक्ति नहीं।

मैलर्स की बांहों के कड़े घरे, उसके गतिमय शरीर के सनसनीपूर्ण स्पंदन, स्खलित तृप्ति का, ऊष्ण प्रवाह- कोनी निष्क्रिय होते हुए भी इन सबसे संबद्ध थी। बेसुध, किंतु पूर्णतः सुबद्ध और लिप्त।
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पर जब मैलर्स हौले-हौले हांफता हुआ निश्चेष्ट उसकी छाती पर ढीला पड़ गया तो कोनी का स्वप्न पिघलना शुरू हुआ।

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