दरअसल, यह ऐसा वक्त है जब बेहद छोटी उम्र से ही बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा दिया जा रहा है और खेलने-कूदने की उम्र में सोशल मीडिया की लत लगा दी जा रही है। अक्सर घरों में अभिभावक बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उनके सामने यूट्यूब वीडियोज और गेम्स खोलकर रख देते हैं ताकि वे इनमें व्यस्त रहें, लेकिन इसकी गंभीरता को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे न सिर्फ बच्चों की आंखें खराब होने की संभावना रहती है बल्कि उनमें हिंसक प्रवृत्ति के विकसित होने का भी खतरा रहता है। इन दिनों 10 साल के नीचे के कई बच्चे आपको सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय मिल जाएंगे, अगर आपके बच्चे भी सोशल मीडिया और गूगल के जमाने में आ गए हैं तो बंदिश लगाने की जगह कुछ सावधानियां आजमाएं।
minor boy playing mobile game
अपने बच्चे से सोशल मीडिया को लेकर बातचीत करें। उससे उसके ऑनलाइन अनुभव के बारे में पूछे और इस दुनिया की सकारात्मक चीजें उसे बताएं। बच्चों को अकेले में सोशल मीडिया पर सक्रिय न रहने दें और न ही अकेले में ज्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल करने दें, क्योंकि यह दुनिया बेहद बड़ी है और आपका बच्चा एक सर्च के जरिए ऐसी जगह पहुंच सकता है जो उसके परवरिश के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
अपने घर में कंप्युटर और लैपटॉप को कॉमन एरिया में रखें ताकि अगर आपका बच्चा उसका इस्तेमाल भी कर रहा है तो आपकी नजरों के सामने रहे। सोशल मीडिया पर बच्चों को ज्यादा सेल्फी और व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से रोके। बच्चों को ऑनलाइन गेम्स के खतरों के बारे में अवगत कराएं और एक वक्त निर्धारित कर दें ताकि आपके बच्चे को ऑनलाइन गेम खेलने की लत न लगे। आप चाहें तो लैपटॉप और कंप्युटर में सर्विलांस सॉफ्टवेयर लगा सकते हैं ताकि आप इस बात को जान सकें कि आपके बच्चे क्या सर्च कर रहे हैं?