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जमाने के साथ बदल रहा है शादियों का चलन

Wed, 13 Apr 2016 06:09 PM IST
आस्था मिश्रा/ अमर उजाला, दिल्ली
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बीते कई सालों में बढ़ती तकनीक से हजारों काम सरल हुए हैं। हजारों नई चीजें हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई हैं। व्हाट्सऐप, सेल्फी जैसे नए शब्द भी सीखे हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि रोजमर्रा की जिंदगी की तरह ही हमारे खास मौके, जश्न मनाने के तरीके भी इन सालों में कितने बदल गए। चाहे त्योहार हों या जिंदगी का सबसे बड़ा जश्न शादी।
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गौर करें तो पिछले कई सालों में आम आदमी के घर-परिवार में भी होने वाली शादियों में भी कितने बदलाव आए हैं। यकीनन आप भी इससे इत्तेफाक रखेंगे कि अब आपके घर में भी शादियां वैसी नहीं होती जैसी 10-15 साल पहले हुआ करती थीं। परंपराओं में भले ही ज्यादा फर्क न आया हो लेकिन उन्हें पूरा करने के ढंग में जरूर आया है। आगे देखिए, क्या क्या हैं वो बदलाव।

बदल गया है दुल्हन का मेकअप और रूप

शादी में सबकी नजर सबसे ज्यादा दुल्हन पर होती है। एक  वक्त था जब मेकअप के नाम पर दुल्हन को ऊपर से नीचे तक ऐसा सजाया जाता था कि पहचानना ही मुश्किल हो जाता था। आंखों के ऊपर लाल-सफेद बिंदियों से सजावट, बालों में भारी भरकम मांग टीका, आंखों के ऊपर ढेर सारा शैडो, गालों पर रूज-ब्लशर, गले में किराए पर लिए हुए आर्टीफीशियल गहने।

वो बड़े-बड़े दो-तीन हार दुल्हन की पूरी गर्दन ही ढक देते थे औऱ उस पर से जयमाल का भार। लेकिन अब मेकअप में भी बहुत बदलाव आया है।

अब दुल्हनें, इतना हैवी मेकअप कराना पसंद नहीं करती। सिर्फ सिलेब्रिटी दुल्हनें ही नहीं, आप देखेंगे तो आम लड़कियां भी अपनी शादी में छोटी सी बिल्दी, हल्का सा मांग टीका, पतला सा काजल लगवाती हैं। कुछ सुर्ख लाल लिपिस्टिक तो कुछ उसमें भी हल्का रंग चुनती हैं। इसी तरह पहनावे की बात करें तो बहुत कुछ नया आया है।

नहीं रह गई लाल जोड़े की बंदिश

चाहे कोई बड़े घर की दुल्हन हो या आम घर की, पुराने जमाने में लहंगे लाल रंग के ही पहने जाते थे। उस पर मोटा जरी या पैच का काम। चोली तो दुल्हन के वजन से भी भारी और उस पर माथे तक आती चुनरी। लेकिन अब गौर करें तो लड़कियां नए-नए डिजाइन आजमा रही हैं। लाल रंग की कोई बंदिश नहीं रह गई है। पेस्टल रंग जैसे हल्के गुलाबी, क्रीम रंग या गाढ़े नारंगी रंग के लहंगे, साड़ी भी आजकल चलन में हैं।

दूल्हे भी अपने लुक को लेकर अब बहुत सोचते हैं। अब दुल्हन-दूल्हा पहले से ही मैचिंग कपड़े तय कर लेते हैं ताकि साथ में खड़े होने पर पर्फेक्ट कपल लगें। लड़के भी सिर्फ शेरवानी नहीं बल्कि पठानी सूट, डिजाइनर धोती कुर्ता भी पहनते हैं।

सेल्फी का चलन जयमाला के वक्त भी दिखता है। खुद दूल्हा-दुल्हन ही अपनी तस्वीर खींच लेते हैं और दोस्तों के साथ मौज मस्ती करते हैं। दुल्हनें अब घूंघट डालें, गर्दन नीचे झुकाए शर्माती नहीं रहतीं।

बढ़ गया है प्री वेडिंग शूट का चलन

आपने भी देखा होगा कि आजकल एक नया ट्रेंड चला है प्री वेडिंग शूट के नाम से। दरअसल इसमें लड़का-लड़की शादी से पहले ही किसी अच्छी सी जगह जाकर, प्रोफेशनल फोटोग्रफरों से अपनी रोमांटिक, मस्ती करते हुए तस्वीरें खिंचवाते हैं, वीडियो बनवाते हैं। ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ फिल्मी सितारों या अमीर लोगों के बीच प्रचलित है।

आजकल शहर का लगभग हर जोड़ा शादी से पहले ऐसा करा रहा है। ये यादें उनके साथ जिंदगी भर रह जाती हैं। खूबसूरत वादियों, इमारतों के बीच दूल्हा-दूल्हन खुद को किसी सिलेब्रिटी से कम नहीं समझते। अब वो दौर धीरे धीरे खत्म हो रहा है जब शादी के बाद दुल्हन को जयमाला पकड़ा कर चार अलग अलग पोज देने को कहा जाता था, कभी अपनी बाली दिखाते हुए, तो कभी चूढ़ी।

अब वो फोटोग्राफर भी कम हो गए हैं जो हैलोजन लाइट या बड़े बड़े वीडियो कैमरा लेकर चलते थे और तस्वीर खींचते वक्त दुल्हन के मुंह पर लाइट मारते थे। बेचारी पहले से थकी हुई दुल्हन के तो और पसीने छूट जाते थे। तकनीक बदलने से अब एक कैमरे और छोटे से ट्राईपॉड से ही तस्वीरें खिंच जाती हैं और वीडियो बन जाते हैं।

चल कर नहीं, पालकी में आती है दुल्हन

बीच में एक दौर आया था जब जयमाला स्टेज पर नहीं बल्कि रिवॉल्विंग यानी घूमने वाले ऊंचे से स्टेज पर होती थी। अच्छी बात ये थी कि इसमें उन दोनों के अलावा कोई और नहीं चढ़ता था वरना स्टेज पर तो ऐसी भीड़ लगती थी कि कोई मेला हो। इसी तरह दुल्हन को जयमाला पकड़ कर स्टेज तक लाने के बजाए पालकी में लाने का चलन भी आया।

सजावट से लेकर प्रेजेंटेशन का तरीका भी बहुत बदला है। लोग थोड़ा ज्यादा पैसा खर्च कर के भी नई नई तरह की सजावटें कराते हैं। चलन ये भी बढ़ गया है कि खुद सब कुछ तय करने के बजाए वेडिंग प्लानर रख लो, जो आपके बजट में खाने से लेकर नाच गाने तक का ध्यान रखेगा। जैसा कि आपने फिल्म बैंड बाजा बारात में भी देखा होगा।
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'लेडीज' नहीं अब होता है सिर्फ संगीत

पहले जमाने में लेडीज संगीत का मतलब होता था कि मोहल्ले की 4-5 औरतें इक्क्ठा हो कर ढोलक बजा कर बन्ना बन्नी गा लेती थीं। लेकिन अब बदलते वक्त के साथ इसे भी पूरे जश्न के साथ मनाया जाता है। अब दोनों परिवार के मेहमान एक ही जगह मिल कर संगीत फंक्शन रखते हैं जिसमें मर्द भी होते हैं। दूल्हा-दुल्हन बकायदा कपल डांस पर्फॉरमेंस की तैयारी करते हैं।

देखा जाए, तो चीजें कई बदलीं हैं, कुछ अच्छी तो कुछ बुरी लेकिन ये सारे ऐसे बदलाव हैं जिन्हें आप भी अपने आस पास महसूस कर सकते हैं। गांवों की शादियों को इससे अलग रख भी दें तो छोटे बड़े हर शहर में ये सब देखने को मिल जाएगा। अगर आपने अब तक महसूस नहीं किया तो घर में होने वाली अगली शादी में कर लीजिएगा। 
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