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वो रोने आई थी या प्यार जताने... ये तो उसे भी नहीं पता था

Tue, 23 Dec 2014 11:10 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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ये अंश पंकज दूबे की किताब 'लूजर कहीं का!' से लिया गया है। ये किताब उन तमाम लूजर्स के नाम है जिन्होंने खुद को खोकर ही खुद को पाया।
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पैक्स को लगा कि अगर बिंदिया इसी तरह सहलाती रही तो वो उसकी टच थेरेपी से ही ठीक हो जाएगा। आज उसे पहली बार महसूस हुआ था कि मार पड़ने के भी फायदे होते हैं। और वो भी एक्साइटिंग फायदे।

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पैक्स की आंखों से भी आंसू ऐसे बहने लगे जैसे आज एमसीडी वाले पानी चलाकर पिक्चर देखने चले गए हों। वो अपने होंठो से उसके गाल पर पड़े आंसू को पी गया। उसे बिंदिया के आंसू, आंसू नहीं अमृत लगे।
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'हम तो उस दिन पोस्टर देखे थे तुम्हारा, प्यार हो गया। प्रॉक्सी बनकर... लॉ फेकल्टी आ गया, ताकि बस देख सकें तुमका,' पैक्स पहली बार दिल की बात बोल पाया।

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बिंदिया ने सिर दाईं तरफ घुमा दिया।

'बात अनसुनी कर रही हो? प्रॉक्सी बनकर जरूर आया था लेकिन मेरा प्यार प्रॉक्सी नहीं है। वो रियल है,' पैक्स ने धीरे से कहा।

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बिंदिया ने अपने होंटों को पैक्स के होंठों पर लगा दिया।

ऐसा लग रहा था कि ओस में डुबाए गए होंठ हों। आंसू जितने गरम, होंठ उतने ही ठंडे थे।

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वो दोनों एक-दूसरे से कुछ कहने की हालत में नहीं थे। पैक्स ने उसे वैसे ही चूमा जैसे उस रात पहली बार रूम में छुपकर उसके पोस्टर को चूमा था।

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चिल्ड बीयर की बोतल खुलने पर जो उफान होता है, वो वैसा ही फील कर रहा था।

पोस्ट से निकलकर वो इस तरह उसकी बांहों में होगी, फंसी हुई, ये अंदाजा, अंदाजे में भी नहीं लगा सकता था।

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आज वो बिंदिया के उन तीन तिलों को छूना चाहता था, जिनके बीच की दूरी उस रोज उसकी सीट के पीछे बैठकर वो भांप चुका था।

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वो पागलों की तरह उन तिलों को चूम रहा था। वो तिल नहीं तिलस्म थे। वो रोने आई थी या प्यार जताने, ये तो पैक्स को भी नहीं पता था। उसे बस पता था ये पल उसके लिए सबसे खास हैं।

दोनों ने बची खुची रात एक-दूसरे से लिपट कर सोते, जागते, बातें करते हुई बिताई।

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