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विश्व संगीत दिवस 2021: 'अच्छे संगीत के लिए तानसेन और कानसेन दोनों की जरूरत'

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कुमार सत्यम (गजल गायक) - फोटो : Instagram
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संगीत साधना है, पूजा है। वर्षों पुरानी इस विधा को देवतुल्य स्थान दिया गया है। पुराणों से लेकर, इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो हर तरफ विशेष प्रकार की संगीत और उसका दिव्य रूप देखने को मिलता है। हर साल 21 जून का दिन, विश्व संगीत दिवस के रूप में संगीत की शक्ति का स्मरण कराने वाला खास दिन होता है। संगीत विशेषज्ञों की मानें तो असल संगीत वही है जिसे 'रूह गाए और रूह सुने'। स्वर के साथ अविरल और अंतहीन रिश्ता बने, जिसमें गायक और श्रोता दोनों ही खो जाएं।
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पुराणों में जिक्र मिलता है कि सृष्टि के निर्माण के समय ही ब्रह्म देव ने संगीत की शक्ति को पहचान लिया था। इसी शक्ति को रूप देने के लिए उन्होंने मां सरस्वती को प्रकट किया। खैर, यह बातें पुराणों की हैं, अब आपको मौजूदा समय में वापस लाते हैं।

भारत में संगीत युगों से सुना-गाया जाता रहा है, पर क्या मौजूदा गानों को असल संगीत माना जा सकता है? क्या अश्लीलता के विष में डूबे गानों के बोल और स्त्री के शरीर की बनावट को बाज की नजरों से देखते गीत के शब्द असल संगीत कहे जा सकते हैं? अगर नहीं, तो जो हम-आप रोज सुन रहे हैं, वह क्या है? और फिर वह संगीत कहां है जिसकी कभी कल्पना की गई थी? विश्व संगीत दिवस पर आइए इसी संबंध में युवा गजल गायक कुमार सत्यम से संगीत के इस बदलते रूप को समझने की कोशिश करते हैं।
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अमर उजाला से बातचीत में कुमार सत्यम बताते हैं, संगीत, गायन वादन और नृत्य का ऐसा समावेश है जो कर्णप्रिय हो। असल संगीत वही है जिसे सुनने पर आत्मा का सीधे ईश्वर से संपर्क हो। सुर, ताल और लय संगीत के मूल आधार हैं। पहले के संगीत को देखें तो उनमें इन तीनों का मिला जुला रूप होता था, पर आज के समय में 'लय' प्रधान हो गया है। लय पर लोग नाच तो लेते हैं, भले ही सुर और शब्द न समझ पाएं।

ऐसा नहीं है कि यह बदलाव अचानक से आ गया है। यह काल दर काल चलती आ रही प्रक्रिया है। गायिकी की शुरुआत ध्रुपद संगीत से हुई, जो बाद में धमार और खयाल में बदलती गई। इसके बाद ठुमरी, दादरा, गजल और इस तरह से समय के साथ-साथ इसमें परिवर्तन आता गया। संगीत अब एक अलग ही दिशा में है, संभवत: इसलिए क्योंकि हम व्याकरण विहीन भाषा सीखने और समझने में लगे हुए हैं, यह जानते हुए भी कि व्याकरण के बिना असल भाषा के तहस-नहस होने का डर रहता है।

असल संगीत तो आत्मा का ईश्वर से मिलन कराने वाली है। जो मौजूदा दौर में गाया-सुना जा रहा है, जिसे लोग, विशेषकर युवा खूब पसंद कर रहे हैं, वह संगीत तो हो ही नहीं हो सकता है।
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भारतीय संगीत - फोटो : Pixabay
ईश्वर की आराधना का एक रूप है संगीत

कुमार सत्यम बताते हैं, धुप्रद गायकी में सारे शब्द ईश्वर को समर्पित होते थे। उसकी बंदिशों में शब्द-ब-शब्द ईश्वर की आराधना होती थी। 

'अधरन मुरलीधरन नटवर नागर, भस्म अंग गौरी संग जटा में बिराजे गंग'

समय के साथ संगीत में आए बदलाव और व्यापारीकरण ने गीतकारों से अच्छे शब्दों के प्रयोग की जैसे कला ही छीन ली हो। 'मुन्नी बदनाम' और 'लड़की ब्यूटीफुल कर गई चुल' सुनने वालों को असल संगीत और उसमें प्रयुक्त अलंकार युक्त करामाती शब्दों के इस्तेमाल के बारे में कैसे पता चल सकेगा? गलती एक तरफा नहीं है, आज के समय में तानसेन और कानसेन दोनों की कमी है।
 
ऐसा भी नहीं है कि लोग अच्छा गा और सुन नहीं रहे हैं, अच्छे संगीत के श्रोता और गायक भी हैं लेकिन दुर्भाग्य से थोड़े कम। हमें लोगों को असल संगीत का अमृत चखाना होगा, जिसके बाद उनको निम्न स्तर का कुछ सूझे ही न। संगीत की दुनिया में फैला अभद्रता और अश्लीलता का विष इसी अमृत से दूर किया जा सकता है।

गानों में अश्लीलता को लेकर कुमार सत्यम कहते हैं, यह मानव की प्रकृति रही है, उसे गलत चीजें ज्यादा आकर्षित करती हैं और तेजी से समझ आती हैं। जब मौजूदा संगीत में अश्लील और अशोभनीय शब्दों का प्रयोग शुरू हुआ तो लोगों को यह पसंद आया, वही... इंसानी फितरत। पर उस समय शायद हम यह ध्यान नहीं दे पाए कि हम संगीत के असल स्वाद से कोसों दूर होते जा रहे हैं। भोजपुरी से लेकर बॉलीवुड, गानों में अश्लीलता को घोला जा रहा है, लोगों को न जाने क्यों यह कड़वा विष मीठा लग रहा है? शायद पाश्चात्य सभ्यताओं को हम ज्यादा प्राथमिकता देने लगे हैं, इसलिए भी।

असल में इसे संगीत और इनके गाने वालों को गायक कहना भी उचित नहीं है। यह तो व्यापार है, गाने बनाने, लोगों को कुछ भी उल्टा-सीधा सुनाने और पैसे कमाने का। असल संगीत की महफिलें आज भी जमती हैं, जहां सादगी में भी बहार आता है। 

हां, इस दौर में एक चीज़ जरूर सुकून देती है वह यह कि युवाओं का एक हिस्सा अब भी वास्तविक संगीत से जुड़ा हुआ है, उसे पसंद करता, समझता है, जिसके लिए 'आन मिलो सजना' ही प्राथमिकता है, 'ब्लू है पानी-पानी' नहीं। इसके अलावा माता-पिता बच्चों को संगीत सीखने के लिए प्ररित कर रहे है, संगीत वही सिखा सकता है जिसे आता होगा।

सौभाग्य से बच्चे अच्छा और वास्तविक संगीत सीख रहे हैं, ऐसे में आशा है भविष्य की पसंद भी वही संगीत होगी जिसकी पूर्वजों ने कल्पना की थी। ये जो दौर है, गानों में अभद्र शब्दों के प्रयोग का, जल्द बीतेगा। नए सुबह होगी, ज्यादा रोशन-ज्यादा चमकदार। जहां वास्तविक संगीत ही गाया और सुना जाएगा। विश्व संगीत दिवस पर हमें यही शपथ लेना है कि अच्छा सुनेंगे। क्योंकि आप अच्छा सुनेंगे तभी अच्छा सोचेंगे, और जब अच्छा सोचेंगे तभी बेहतर राष्ट्र की निर्माण होगा। ऐसा राष्ट्र जहां कर्णप्रिय संगीत चारो ओर सुनाई देगा।

आइए आपको कुमार सत्यम के इस गीत के साथ छोड़ जाते है।
 
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नोट: यह लेख युवा गजल गायक कुमार सत्यम से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। कुमार सत्यम शास्त्रीय संगीत, गजल और ठुमरी गायकी के लिए मशहूर हैं।


 
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