फ़िलहाल स्वीडन में क़रीब पंद्रह हज़ार से ज्यादा भारतीय रह रहे हैं।
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यही वजह है कि दिवाली से जुड़े कार्यक्रमों की शुरूआत आज से हो रही है। स्टॉकहोम में लंबे समय से रहने वाले एक भारतीय परिवार ने बताया कि कुछ साल पहले तक यहां त्योहारों को लेकर इतनी सक्रियता नहीं देखी जाती थी। इक्का दुक्का जगहों पर दशहरा मनाया जाता था। भारतीय समुदाय के लोगों के लिए त्योहार मनाने का एकमात्र स्थान मंदिर ही था। लेकिन अब कई जगहों पर त्योहार धूमधाम से मनाये जाने लगे हैं। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को ख़ास आयोजन होने लगे हैं। सिंदूर खेला और विदाई की रस्में भी बड़े अच्छे से निभाई जा रही हैं। इन आयोजनों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं और मनोरंजन कार्यक्रमों व खान पान पर दिल खोलकर ख़र्च कर रहे हैं। मज़े कि बात यह है कि इन क्रायक्रमों का हिस्सा दूसरे देशों के लोग भी बन रहे हैं।
लोगबाग स्वदेश से कपड़े, पूजा की सामग्री और ऑथेंटिक इंडियन फ़ूड को तैयार करने के लिए ख़ास मसालों व खाद्य सामग्रियों को मंगाने में जुट गये हैं। वहीं, भारतीय समुदाय के लोगों की ओर से पूजा की तैयारियों से जुड़ी जानकारियां भी फ़ेसबुक व व्हाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्किंग साइ्टस के ज़रिये दी जा रही है। ऐसा नहीं है कि यहां भारतीय खाद्य सामग्रियों को रखने वाले डिपार्टमेंटल/ ग्रॉसरी स्टोर नहीं हैं। लेकिन अब भी भारत से यहां आने वाले अधिकांश लोगों के बैग में खानेपीने के समान की पैकिंग ख़ास तौर पर होती है।
फ़िलहाल स्वीडन में क़रीब पंद्रह हज़ार से ज्यादा भारतीय रह रहे हैं। कोई कुछ दिनों या सालों के लिए कंपनी की ओर से यहां काम करने आया है तो कुछ भारतीय यहां नया आशियाना बसा रहे हैं। इन सबको त्योहारों पर अपने वतन की कमी खले नहीं इसलिए भारतीय रेस्तरां भी ख़ास तैयारी कर रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इनके करवाचौथ और दीपावली स्पेशल थाली, व्यंजन, टेबल की अग्रिम बुकिंग पर छूट और कॉम्प्लीमेंट्री ऑफ़र के विज्ञापन रोज़ आ रहे हैं।
कई स्वीडिश ऐसे भी हैं जो भारतीय व्यंजनों के दीवाने हैं।
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जबकि दक्षिण एशियाई देशों से जुड़े ग्रॉसरी बेचने वाले स्टोर भी अभी से ही खाने पीने की चीज़ों से दुकान भर रहे हैं। लेकिन जब बात घर जैसे खाने, माहौल की हो तो ये सब कुछ फीका लगने लगता है। इसलिए फ़ेसबुक और व्हाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्क से जुड़े लोग एक दूसरे के घर जाकर या एक जगह एकत्रित होकर दीपावली का त्योहार मनाने की कोशिश करते है।
आपको बता दूं कि यहां होने वाले रंगारंग कार्यक्रमों में स्वीडिश लोगों की भागीदारी भी होने लगी है। जबकि कई स्वीडिश ऐसे भी हैं जो भारतीय व्यंजनों के दीवाने हैं। वे भारतीय ख़ानपान और संस्कृति का प्रचार कर रहे हैं। जिसकी जानकारी मैं अगली किश्त में दूंगी। कई स्वीडिश महिलाएं और पुरुष सत्संग और इस्कॉन से जुड़े हुए हैं, जो भारतीय त्योहार समारोह में शिरकत करते हैं। मुझे हैरानी तो तब हुई जब एक अधेड़ उम्र की स्वीडिश महिला ने हिंदी दिवस समारोह में हिस्सा लिया था। ऐसा नहीं है कि उन्हें हिंदी का ज्ञान था। लेकिन हिंदी और हिंदुस्तान के प्रति उनका लगाव ज़रूर था। दीवाली के रंगारंग कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वाले भारतीयों के अलावा दूसरे देशों के लोग भी हैं जो नृत्य संगीत, तबला वादन, बांसुरी समेत तमाम वाद्ययंत्रों को बजाना बख़ूबी जानते हैं।
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