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Perfect Day: हर दिन को बनाना चाहते हैं परफेक्ट तो जीवनशैली में अपनाएं ये बातें

Sat, 14 Jun 2025 04:46 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

Perfect Day: क्या जिंदगी के प्रवाह के साथ आगे बढ़ते रहने में असली खुशी समाहित है या फिर अपने हर दिन को परफेक्ट यानी आदर्श बनाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए? जानकार कहते हैं कि आप संतुलन और प्रबंधन की कुंजी से अपने हर दिन को ‘परफेक्ट’ बना सकती हैं।
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परफेक्ट दिन के लिए क्या करें - फोटो : Adobe
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विस्तार
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अंशु सिंह

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अमेरिका के मिनेसोटा की समाजसेवी विक्टोरिया मैकवेन क्रीक के लिए एक आदर्श दिन का मतलब है- सुबह उठना, कुछ ऐसा करना, जिससे उनका परिवार और दोस्त जुड़े रहें। साथ ही दुनिया के लिए कुछ अच्छा करना, हंसना और झपकी लेना। दूसरी ओर, उनकी उद्यमी दोस्त शैली जीवन में आदर्श स्थिति को पूरी तरह से मिथक मानती हैं। उनका मानना है कि किसी भी तरह की ‘पूर्णता’ के पीछे भागने से केवल तनाव, पीड़ा और ढेर सारे आत्मसंदेह मिलते हैं। वह कहती हैं कि किसी एक दिन आप अपना सर्वश्रेष्ठ देती हैं और दूसरे दिन सब कुछ उथल-पुथल हो जाता है।

लेकिन सच कहें तो यही हमारे जीवन को अद्वितीय और दिलचस्प बनाता है। सोचकर देखिए, अगर समाज में सभी ‘पूर्णता’ वाले होते तो जीवन कितना उबाऊ होता। ये दोनों वक्तव्य दर्शाते हैं कि हर व्यक्ति के लिए ‘आदर्श दिन’ की परिभाषा अलग हो सकती है। ऐसे में ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अध्ययनकर्ताओं का एक अध्ययन ध्यान खींचता है। इसके अनुसार, एक ‘परफेक्ट दिन’ सिर्फ ‘अच्छा महसूस करने’ से कहीं ज्यादा है। इसका आशय है कि आप अपना समय व्यवस्थित तरीके से कैसे बिताती हैं?
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आपका रूटीन ऐसा हो, जो आपको खुशी प्रदान करे और संतुष्टि की अनुभूति कराए। अध्ययन में कुछ और भी तथ्य उजागर हुए, जो हर एक दिन को परफेक्ट बनाने के लिए आवश्यक हैं।
मसलन, आपको परिवार एवं दोस्तों को कितना समय देना चाहिए?
एक्सरसाइज एवं खाने-पीने के लिए कितना वक्त निकालना चाहिए?
ऑफिस कार्य के लिए कितना समय देना उपयुक्त होता है?
स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए?

कहने का अर्थ है कि इन सभी गतिविधियों में जितना संतुलन होगा, आपका जीवन उतना ही खुशहाल होगा और आप कह पाएंगी कि हर एक दिन परफेक्ट है।

परिवार संग सुकून का अहसास

आखिर कौन होगा, जो अपने दिन को खुशनुमा नहीं बनाना चाहेगा। अब तो मनोवैज्ञानिक भी इसका एक सूत्र ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं। दरअसल, ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सामाजिक मनोवैज्ञानिक डुनिगन फोक ने अमेरिकी टाइम यूज सर्वे के 2013 से 2021 के बीच के डाटा का विश्लेषण कर महिला-पुरुषों की उन गतिविधियों के बारे में पता लगाने की कोशिश कि जो उन्हें अपेक्षाकृत अधिक खुशी देती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से किए गए इस अध्ययन से पता चला कि परिवार संग समय बिताना सबसे ज्यादा खुशी देता है। जो लोग अपने परिवार के साथ कम से कम छह घंटे बिताते हैं, उससे उनका दिन आदर्श बनता है। क्या आपने कभी खुद से पूछा है कि परिवार क्यों महत्वपूर्ण है? स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया की दुनिया में हममें से कई लोग वास्तव में उन तरीकों से कम सामाजिक हो गए हैं, जो न केवल फायदेमंद हैं, बल्कि हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक भी हैं।

अमेरिकन जर्नल ऑफ हेल्थ प्रमोशन का सिग्ना अध्ययन संकेत देता है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग अकेलेपन के सबसे बड़े जोखिम कारकों में से एक है। शायद इसलिए मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आ रही है कि पूरे दिन में स्क्रीन टाइम एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके बदले जब आप अपने परिजनों के  साथ क्वालिटी टाइम व्यतीत करती हैं तो आपको उनसे भावनात्मक समर्थन एवं स्नेह मिलता है। यह न सिर्फ रिश्तों को मजबूत बनाता है, बल्कि खुशहाली भी लाता है। कोरिया में तो एक कहावत बहुत प्रचलित है कि ‘जब परिवार खुश रहता है तो सब कुछ अच्छा होता है।’

दोस्त जरूरी हैं

परिवार के साथ रहने से समग्र मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आता है। परिवार ही हमें वह बनाता है, जो हम हैं। अमेरिका की पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस वन का एक अध्ययन कहता है कि तनाव, खुशी और स्वास्थ्य के स्तर का अनुमान लोगों के सामाजिक दायरे की ताकत से लगाया जा सकता है, न कि फिटनेस ट्रैकर पर एकत्र किए गए शारीरिक स्वास्थ्य डाटा से। यह दर्शाता है कि परिवार (या करीबी दोस्तों, जिन्हें आप परिवार कहती हैं) के साथ समय बिताना हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है। यह भी याद रखना होगा कि परिवार का मतलब सिर्फ रक्त संबंधी ही नहीं, बल्कि करीबी दोस्त या अभिभावक भी हो सकते हैं, जिन्हें आप परिवार मानती हैं।

रग्बी खिलाड़ी श्वेता शाही कहती हैं, “जीवन में जब कभी नीरसता आती है तो दोस्तों से मिलने वाला भावनात्मक समर्थन हमें प्रेरित एवं चुनौतियों से पार पाने के लिए प्रोत्साहित करता है। हमारे अकेलेपन को दूर करता है। आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान को बढ़ाता है। जिन करीबी दोस्तों से हम महीनों नहीं मिल पाते, उनसे एक दिन भी अपने दिल की बात शेयर करके मन हल्का हो जाता है और हमारा दिन बन जाता है।”

ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अध्ययन में भी सामने आया कि दोस्तों के साथ कम से कम दो घंटे बिताने से खुशी का पारा कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि दोस्त हमारे मानसिक स्वास्थ्य एवं समग्र खुशी को बनाए रखने में काफी मदद करते हैं। अमेरिकी जर्नल ऑफ साइकियाट्री 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जिनके पास करीबी एवं विश्वासी मित्र होते हैं, वे जीवन से अधिक संतुष्ट होते हैं और अवसाद से ग्रस्त होने की आशंका भी कम होती है।

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सबसे लिए परफेक्ट डे का अलग मतलब - फोटो : adobe
ऑफिस के बाद...

आज महिलाएं हाइब्रिड मोड में काम कर रही हैं। कार्य-शैली में आए इस लचीलेपन के फायदे हैं तो नुकसान भी कम नहीं हैं। जैसे सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल सविता को हफ्ते में दो दिन नोएडा से गुरुग्राम जाना होता है। ये दो दिन उनके लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण होते हैं। घंटों ट्रैफिक में फंसने के कारण समय की बर्बादी तो होती ही है, काम का दबाव बढ़ जाता है, सो अलग। इससे फिर अनावश्यक तनाव पैदा होता है। चिड़चिड़ापन, बेचैनी, अवसाद जैसी अन्य मानसिक समस्याएं होने लगती हैं।

मनोवैज्ञानिक डॉ. पल्लवी प्रकाश कहती हैं, “कामकाजी महिलाओं पर घर-दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारी होती है। कई बार इनमें संतुलन बनाए रखने की कोशिश में परिवार, बच्चे पीछे छूट जाते हैं और वे अपराधबोध से ग्रसित हो जाती हैं। लेकिन जितना जल्दी वे इसका निदान निकाल लेती हैं, उतना ही शीघ्र अपराधबोध के चक्र से निकल पाती हैं और अपने दिन को खुशहाल बना सकती हैं।” इसलिए महिलाओं को ध्यान रखना होगा कि ऑफिस से घर आने पर वे केवल बच्चों और परिवार पर ध्यान दें। उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं। अगर वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं, तो निजी एवं पेशेवर कार्यों के बीच संतुलन रखें। साथ ही अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें। नियमित वॉक, व्यायाम एवं मेडिटेशन करें। इससे एकाग्रता बढ़ेगी। समय का सदुपयोग करने से संतुष्टि आएगी और वे खुश रहेंगी। वैसे भी स्वस्थ मन, जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है और खुशी को बढ़ाता है।

परफेक्ट की परिभाषा

गुरुग्राम की निजी कंपनी में कार्यरत महक का मानना है कि परफेक्ट दिन कैसा होगा, यह हम तय करते हैं। वह कहती हैं, “एक आदर्श दिन का विचार व्यक्तिपरक है, जो हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकता है। एक व्यक्ति के लिए जो आदर्श दिन होता है, वह दूसरे के लिए समान नहीं हो सकता। मसलन, मेरे लिए बेहतरीन दिन वह होता है, जब मैं बहुत ज्यादा नहीं सोचती और किसी भी चीज को लेकर तनाव में नहीं आती। इसके अलावा जिस दिन अपनी नींद पूरी करती हूं तो वह दिन मेरे लिए परफेक्ट होता है।” महक की यह सोच स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि अपने दिन को परफेक्ट बनाना हमारे ही हाथ में है। हम क्या सोचते हैं, कैसा महसूस करते हैं और दिन के पलों को कैसे जीते हैं, यही तय करता है कि हमारा दिन कैसा बीतेगा। इसलिए परफेक्ट दिन की कुंजी हमारे नजरिए और सोच में छिपी होती है, जिसकी मदद से आप अपने परफेक्ट दिन का ताला खोल सकती हैं।

खुश रहना सीख लें

एक संतुलित जीवन के लिए हर व्यक्ति को आत्मानुशासन की आवश्यकता भी होती है। उसे अपने समय को इस प्रकार से बांटना होता है, जिससे कि परिवार, दोस्तों या खुद की उपेक्षा न हो। अगर आप ज्यादातर समय खुश और स्वस्थ महसूस करती हैं और आपका परिवार भी आपसे खुश रहता है तो आप शायद जीवन का अच्छी तरह से प्रबंधन कर रही हैं। लेकिन आपको अपने लिए समय बिताने के तरीके को भी संतुलित करने की जरूरत है।

समाजशास्त्री आभा सिंह की मानें तो हम जीवन में घटित होने वाली अप्रत्याशित घटनाओं को नहीं रोक सकते, जैसे मौसम खराब होना, स्वास्थ्य समस्या आना, योजना में बदलाव आदि। ऐसे में यदि हम एक आदर्श दिन बिताने का लक्ष्य रखते हैं तो कोई भी छोटी-सी अपूर्णता समग्र अनुभव को प्रभावित कर सकती है। इसी प्रकार तनाव, चिंता या उदासी जैसी आंतरिक भावनाएं किसी भी दिन को आदर्श महसूस करने से रोक सकती हैं। जीवन उतार-चढ़ाव का मिश्रण है। अच्छे और बुरे, दोनों को गले लगाने से पूर्णता के अप्राप्य आदर्श के लिए प्रयास करने के बजाय अधिक संतुष्टिदायक अनुभव हो सकता है।


हफ्ते में एक-दो ‘चीट डे’ हो सकते हैं...
 
मनोवैज्ञानिक डॉ. हेमा खन्ना कहती हैं, अपने दिन को परफेक्ट बनाना असंभव नहीं है। इसके लिए जीवन में छोटे-छोटे लक्ष्य बनाने होते हैं। इस तरह जब भी कोई छोटा या बड़ा कार्य पूरा होता है तो वह आपको खुशी देता है। अगले दिन को और बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता है।

यह भी सच है कि हर दिन एक जैसा रूटीन होने से बोरियत हो सकती है। उसे दूर करने के लिए अलग-अलग दिन नई चीजें करने की कोशिश करनी चाहिए। अपनी दिनचर्या में परिवर्तन लाकर एकरसता को समाप्त किया जा सकता है। कभी एक्सरसाइज करें, कभी वॉक पर निकल जाएं या मेडिटेशन कर लें। प्लानिंग स्वयं आपको करनी है कि आपको किस कार्य में खुशी मिलती है। आप अपने किसी अधूरे शौक को पूरा कर सकती हैं। जितना समर्पण एवं अनुशासन के साथ दिनचर्या का पालन करेंगी, उतना ही अधिक लाभ आपको मिलेगा। सब कुछ आपकी इच्छाशक्ति एवं दृढ़ निश्चय पर निर्भर है। यह कतई जरूरी नहीं कि दिन को परफेक्ट बनाने की कोशिश में आप अपने ऊपर अनावश्यक दबाव लेना शुरू कर दें। हफ्ते के एक या दो दिन ‘चीट डे’ हो सकते हैं। हल्की रहें। परिवार एवं दोस्तों के संग क्वालिटी टाइम बिताएं, अपने मनोबल को ऊंचा रखें और सामाजिक मेल-जोल बढ़ाएं।
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