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इस साल क्या रहेगा स्वाद का हाल?

Sat, 27 Jan 2018 10:18 AM IST
पुष्पेश पंत
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हर नए साल के स्वागत में दावतों का दौर गर्म होता है और हममें से अधिकांश यह जानने को बेचैन होने लगते हैं कि आगे क्या कुछ हमारी जुबान को लुभाने के लिए प्रकट हो सकता है? हकीकत यह है कि आजकल बहूत कम लोग यह तय करते हैं कि वह क्या खाएंगे? ‘हमारी पसंद’ तय करते हैं, मशहूर हस्ती के अवतार में पेशेवर बावर्ची, बड़े पैमाने पर नए दौर के आकर्षक डिब्बे या बोतल में बंद झटपट खाए जा सकने वाले पदार्थ बनाने वाली बड़ी कंपनियां। 
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एवं वह ताराछाप रेस्तरां और अपूर्ण सड़क छाप ढाबे, छोटे शहरों और गुमनाम कस्बों में हम आंख मूंद कर भरोसा करते हैं। कपड़ों और हिंगलिश बोली के चालू मुहावरों की तरह खाने-पीने के फैशन भी तेजी से बदलते रहे हैं। अत: भविष्यवाणी करना जोखिम का काम है पर फिर भी- हमारी राय में इस साल टेलिविजन और यू ट्यूब पर प्रसारित खाने के कार्यक्रम- राज रसोई और मास्टर शेफ सरीखे दर्शकों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने के साथ-साथ उनको दिखलाए व्यंजनों को आजमाने के लिए प्रेरक का काम करेंगे। अपने देसी खाने की गौरव गाथा सुन नई पीढ़ी, फिरंगी फास्ट फूड के तिलिस्म से छुटकारा पाने की दिशा में बढ़ेगी।

बड़ी संख्या में नौजवान पीढ़ी पारंपरिक वर्जनाओं के बारे में तर्कसंगत तरीके से सोचना शुरू करेगी और भारतीय रसोई की भुला दी गई विरासत को अपनाएगी। खाने की गुणवत्ता के बारे में सतर्कता बरतेगी। इस दिशा में एफएसएसआई का योगदान उल्लेखनीय है। नुक्कड़ के खोमचे की चाट से मंदिर के प्रसाद और लंगर तक मशीनीकरण बढ़ रहा है। कुुदरती रंग गंध तथा स्वाद कृत्रिम को पटकनी देते नजर आते हैं। नमक और चीनी के दूरगामी नुकसान जगजाहिर है। हृदय रोग, रक्तचाप, मधुमेह की आशंका के कारण खानपान में संतुलन और परहेज बढ़ेगा। इसके साथ ही मोटे अनाज बाजरा, रागी और कच्ची घानी के तेलों का इस्तेमाल बढ़ेगा। 

बाबा रामदेव के आलोचक भी यह नकार नहीं सकते की कुदरती, स्वास्थ्यप्रद भोजन के बारे में नागरिकों को पतंजलि समूह ने जागरूक बनाया है। खालिस पदार्थ अभी महंगे पहुंच के बाहर लगते हैं, पर जैसे-जैसे इनकी मांग बढ़ेगी कीमतें गिरने लगेंगी। लोग लेबल पढ़ कर ही कुछ खाएंगे पिएंगे।

 

झक मारकर ही सही, सभी बहूराष्ट्रीय कंपनियों को अपने उत्पाद भारतीय ग्राहक के स्वादानुसार बदलने पड़े हैं- मैकडोनाल्ड हो या पिज्जा वाले। सबने आलू टिक्की और पनीर टिक्के के सामने घुटने टेके हैं। इस साल यह प्रवृत्ति और तेज होगी। दक्षिण भारतीय और पूर्वोत्तर के व्यंजन दूसरे सूबों तक पहुंच रहे हैं। यह तंदूरी मुर्ग, बटर चिकन, दाल बुखारा के बुढ़ापे को रेखांकित कर नए ‘नौजवान’ देसी  विदेशी पकवानों के लिए राह बनाएंगे। बिहारी, नागा, असमी के साथ थाई और भूमध्यसागरीय और मैक्सिको का जायका हिंदुस्तान के कई कस्बों तक पहुंचेगा, ऐसा हमारा मानना है।

घर के खाने का रूपांतर तेज होगा। सिर्फ उपकरणों की वजह से नहीं पर तरह-तरह की सब्जियों, फलों तथा पहले से कटे साफ किए मांस-मछली जैसे उत्पादों के सुलभ होने की वजह से भी। फ्यूजन धीरे-धीरे रेस्तरां और होटल से चल कर घरों में दाखिल होगा। खाना-पकाना कभी महिलाओं की ही जिम्मेदारी समझा जाता था। इस साल पुरुष रसोई में कड़छी चलाना  शर्मनाक नहीं समझेंगे। 
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‘हमारी पसंद’ तय करते हैं मशहूर हस्ती के अवतार में पेशेवर बावर्ची, जिनके ऊपर हम आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं. लेकिन अब जायका बदेलगा। दक्षिण और पूर्वोत्तर के व्यंजन भी अब दूसरे सूबों तक पहुंचेंगे। झक मारकर ही सही, सभी बहूराष्ट्रीय कंपनियों को अपने उत्पाद भारतीय ग्राहक के स्वादानुसार बदलने पड़े हैं- मैकडोनाल्ड हो या पिज्जा वाले। सबने आलू टिक्की और पनीर टिक्के के सामने घुटने टेके हैं। वहीं, असमी भोजन के साथ थाई, भूमध्यसागरीय और मैक्सिको का जायका  हिंदुस्तान के कई कस्बों तक पहुंचेगा। 
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