दक्षिण की तरफ वह सहारा मरुस्थल से संलग्न है। ये तीनों प्रभाव उसके भोजन में देखने को मिलते हैं। उत्तर दिशा में यूरोप के देश स्पेन सरीखे नजदीकी पड़ोसी हैं और यूरोपीय खानपान परंपरा का असर भी मोरक्को के खानपान में मिलता है। कैसाब्लांका रईस यूरोपियनों का चहेता ऐशगाह रहा है और मराकेश का संस्कार भी उदार बहुलवादी रहा है। जिस समय इस्लाम का ज्वार उफान पर था, मूर हमलावर स्पेन पर कब्जा कर यहां तक पहुंच गए थे। संसार की सबसे बड़ी मस्जिदों में एक मोरक्को में देखी जा सकती है।
मछलियों को चाव से खाया जाता है और जो मांस सबसे अधिक लोकप्रिय हैं, वह बकरी, मुर्गा और गोमांस हैं। सूअर का गोश्त वर्जित है। दुरहम यानी चोकड़ मिली गेहूं की रोटी तवे जैसे बर्तन में सेंकी जाती है और नानबाई के यहां से खमीर चढ़ी रोटी भी खरीदकर खाई जाती है। पुदीने वाली चाय के साथ रोटी नाश्ते में रंग जमाती है।
‘मर्तबाक’ नाम की परतदार खस्ता रोटी पेस्ट्री का रूप धर लेती है। ‘काब अल गजेल’ मोरक्को की मशहूर मिठाई है, जिसका अनुवाद है ‘हरिण शृंग’। यह नाम इसकी शक्ल को देखकर तय किया गया लगता है। लंबी पेस्ट्री को पिसे बादाम से भरकर ऊपर से शक्कर छिड़ककर इन्हें बनाया जाता है।
‘हलवा चेबकिया’ को आप मीठी पकौड़ी कह सकते हैं। मोरक्को में खाने का आरंभ सलाद से होता है, जो आमतौर पर शाकाहारी होते हैं- यह ठंडे तथा गरम परोसे जाते हैं। जैतून का तेल अन्य भूमध्यसागरीय देशों की तरह यहां भी लोकप्रिय है। इसके बाद नंबर आता है ‘टैजीन’ का, जो इसी नाम के मिट्टी के कैसरोल नुमा उथले पात्र में पकाया जाता है। उबले मांस का जायका बढ़ाते हैं खूबानी, आलूचे और खजूर आदि फल। इसे तले आलुओं के साथ खाया जाता है।
जनश्रुति के अनुसार, यह प्रसिद्ध खलीफा हारूं अल रशीद के जमाने से पकाया जा रहा है- कम से कम सातवीं-आठवीं सदी से। फिर प्रकट होते हैं मांस-मुर्गी। अधिकांश सामिष व्यंजन सब्जियों के साथ पकाए जाते हैं। अक्सर इन्हें कूसकूस के ऊपर रखकर खिलाया जाता है। कूसकूस दलिए की शक्ल वाला दुरहम गेहूं से बना अनाज है। ‘पास्टिला’ एक मिठाई और दिलकश मोरक्को पाई है। इसे आमतौर पर बहुत विशेष अवसरों जैसे शादियों में परोसा जाता है। ‘बिसारा’ नाम का सूप खाने का अभिन्न अंग समझा जाता है। खाने को स्वादिष्ट बनाने के लिए नींबू के अचार, तिल के बीज तथा जैतून के तेल का प्रयोग होता है।
दूसरे अरब देशों की तुलना में मोरक्को के खाने में मसालों का उपयोग कहीं ज्यादा होता है। जीरा, दालचीनी, धनिया, काली और लालमिर्च, अजवाइन, मेथी सभी का जायका यहां के लोगों की जुबान पर चढ़ा है। ये मसाले सदियों पहले अरब सौदागरों द्वारा यहां पहुंचाए गए थे। जावित्री जायफल से भी यह अपरिचित नहीं। मजेदार बात यह है कि हल्दी की रंगत यहां नजर नहीं आती! हमारे गरम मसाले की तरह ‘रस अल हनाउत’ नामक 27 मसालों का मिश्रण विशेष व्यंजनों में जान डालता है।