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'कांटेदार' कटहल के बारे में ये रोचक तथ्य नहीं जानते होंगे आप, इसे काटना भी एक कला

Sun, 08 Apr 2018 03:39 PM IST
मनोरंजन डेस्क, अमर उजाला
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कटहल का जन्म स्थान दक्षिण-पश्चिमी भारत ही है और यही से वह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों और अफ्रीका तक पहुंचा।  कटहल को काटना थोड़ा झंझट भरा काम है, फिर भी इसके दीवाने देश भर में अलग-अलग स्वाद में इसका आनंद उठाते हैं।

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कटहल उत्तरी भारत में सब्जी के रूप में ही ज्यादातर इस्तेमाल किया जाता है, जबकि दक्षिण भारत एवं पूर्वी और पश्चिमी तटवर्ती इलाके में पके कटहल का आनंद फल की तरह भी लिया जाता है। इसके चाहने वालों का मानना है कि इसके स्वाद में सेब, केला, आम और अनानास का अद्भुत संगम चखने को मिलता है। वनस्पतीशास्त्री इसे सब्जी नहीं, बल्कि फल की बिरादरी में ही शामिल करते हैं। दिक्कत यह है कि फल कहिए या सब्जी कटहल को हाथ लगाना जरा झंझट भरा काम है। इसकी त्वचा सख्त और कांटेदार होती है। फल खासा भरकम होता है और धारदार चाकू से काटने पर, जो सफेद चिपचिपा लसदार रस बाहर निकलता है, वह कटहल को साफ करना और छोटे टुकड़ों में काटना दुभर बना देता है। हथेली में तेल लगाकर इसे जल्दी काटने का कौशल अभ्यास से ही हासिल किया जा सकता है। हाल के दिनों में कटा कटाया कटहल अपनी जरूरत के अनुसार, सब्जी की दुकान से खरीदा जा सकता है और इसलिए इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी है। 

कटहल का अंग्रेजी नाम है ‘जैकफ्रूट’, जो पुर्तगाली ‘जैका’ से बना है, जो खुद मलयालम के ‘चक्का’ शब्द का बिगड़ा रूप है। ‘चक्काफलम’ अर्थात कटहल के दर्शन पहले पहल पुर्तगालियों ने केरल में ही किए थे और इससे बनने वाले व्यंजनों का वर्णन लगभग पांच सौ साल पुराने पुर्तगाली यात्रा वृतांतों में मिलता है। विद्वानों का मानना है कि कटहल का जन्म स्थान दक्षिण-पश्चिमी भारत ही है और यही से वह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों और अफ्रीका तक पहुंचा। यूं दक्षिण-पूर्व एशिया में कटहल की शक्ल से मिलता-जुलता ‘दुरियन’ नामक फल पाया जाता है, जो स्वादिष्ट तो होता है पर अपनी जन्मजात दुर्गंध के कारण विमानों में नहीं ले जाया जा सकता और इसी कारण स्थानीय पसंद ही बना रह गया है। 

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कटहल का कलेवर कुछ-कुछ मांस जैसा होता है, जो शाकाहारी बिना अपना दीन-धर्म खराब किए मांसाहार जैसा सुख भोगना चाहते हैं, वह कटहल का कलिया, कटहल के कबाब, कोफ्ते, कटहल की बिरयानी और पुलाव ईजाद कर चुके हैं। बंगाल और उड़ीसा में जिस तरह मछली को ‘जल तुरई’ कहा जाता है। कुछ उसी अंदाज में कटहल को ‘गाछपाठा’ अर्थात् पेड़ पर पैदा होने वाला ‘बकरी का बच्चा’ कहा जाता है।  यूं कटहल की तरी वाली सब्जी उत्तर भारत में कम खाने को मिलती है।

कटहल का सबसे अधिक उत्पादन केरल में होता है और वहां इसके चिप्स भी बड़े चाव से खाए जाते हैं। केरल में इसे राज्य का फल घोषित किया है, जबकि बांग्लादेश में यह राष्ट्रीय फल है। अफ्रीका में कटहल को मांस या झींगों के साथ पकाने का रिवाज है, तो फिलीपीन्स में इसकी तरकारी नारियल के दूध के साथ बनाई जाती है। केरल में कटहल का हलवा भी बनाया जाता है और कटहल के गूदे से घोल तैयार कर इसके डोसे और अडई भी बनाए जाते हैं। सौ ग्राम कटहल में लगभग पौने चार सौ कैलोरी ऊर्जा होती है और इसका रेशा सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है। 

झारखंड वालों का मानना है कि भारत में सबसे बेहतरीन कटहल उन्हीं के यहां पैदा होता है, जबकि महाराष्ट्र और कर्नाटक वालों को लगता है कि उनके ‘फर्णस’ का मुकाबला किसी दूसरी जगह का कटहल नहीं कर सकता। दक्षिण में कटहल के बीजों को अलग से भी पकाकर चबैने के रूप में खाया-खिलाया जाता है। कटहल की पत्तियों का उपयोग केले की पत्तियों की तरह पतूरी को भाप में पकाने के लिए आवरण के रूप में किया जाता है। 
 
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जहां कटहल नहीं होता था, वहां भी आज कटहल पहुंच चुका है। मौसम बीत जाने के बाद भी कटहल के आचार की सहायता से इसके मजे लिए जा सकते हैं। हाल ही में सरकारी क्षेत्र के उपक्रम मदर डेयरी ने जमे हुए कटहल को बाजार में पेश किया है, जिसके बाद कटहल के टिक्के, कबाब बनाना और भी आसान हो गया है। 

हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि कटहल को स्वादिष्ट बनाने के लिए इसे तेल में तलना जरूरी है और स्वादिष्ट बनाने के लिए लहसुन-प्याज, गर्म मसाले आदि का खुले हाथ से इस्तेमाल भी। हमारी राय में ऐसा करना मांसाहारियों का अंध अनुसरण है।

छोटे आकार का कटहल खुद बड़ा स्वादिष्ट होता है और इस कुदरती जायके का आनंद आप बिना तले-भुने बखूबी ले सकते हैं। हां, यह जरूरी है कि किसी एक पाक विधि के गुलाम न बने रहें और देश के विभिन्न भागों में कटहल के लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजनों से अपना परिचय बढ़ाएं। 
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