चीन का दावा है कि किमची एक चीनी व्यंजन से ही विकसित हुई है। कोरियाई डटकर इस मत का खंडन करते हैं। आज यूनेस्को ने मानव सभ्यता की साझे की विरासत सूची में किमची को शामिल कर लिया है और यह कोरिया के ही खाते में दर्ज है। कोरिया वालों का विश्वास है कि किमची शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाकर अनेक संक्रामक रोगों से बचाता है।
चीनी भोजन भारत में बहुत लंबे समय से खाया जा रहा है। बड़े शहरों में ही नहीं, छोटे कस्बे भी चाऊमीन तथा डिमसम जैसे मोमोज से सुपरिचित हैं। परंतु हममें से अधिकांश पूर्वी एशिया के अन्य देशों के व्यंजनों के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। यही कारण है कि चीन तथा जापान के पड़ोसी कोरिया के राष्ट्रीय व्यंजन किमची का नाम कम लोगों ने सुना है। कोरिया का विभाजन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ था, पर किमची उत्तरी तथा दक्षिणी कोरिया दोनों ही में समान रूप से लोकप्रिय है।
किमची वास्तव में, अचारनुमा खट्ट-मीठी, तीखी-नमकीन की पेशकश है, जिसे तरह-तरह की हरी एवं रंगीन बंदगोभियों, हरी पत्तियों वाले साग और मूली की जड़ से हल्का खमीर चढ़ाकर बनाया जाता है। कुछ वैसे ही जैसे पंजाब में काली गाजर की कांजी बनाई जाती है। नमक के अलावा इन सब्जियों को स्वादिष्ट बनाने तथा खराब होने से बचाने के लिए मिर्ची तथा कुदरती रूप से नमकीन समुद्री जीवों का इस्तेमाल भी किया जाता है।
अचार की ही तरह किमची को बड़े-बड़े मर्तबानों में रखा जाता है। किमची का उल्लेख ईसा के जन्म के पहले वाली शताब्दी के कोरियाई साहित्यिक स्रोतों में मिलता है, जिस कालखंड को ‘तीन राजवंशों का युग’ कहा जाता है। विद्वानों ने किमची शब्द का मूल प्राचीन कोरियाई भाषा में तलाशा है। हालांकि चीन का दावा है कि किमची एक चीनी व्यंजन से ही विकसित हुई है। कोरियाई डटकर इस मत का खंडन करते हैं।
यह बात नकारी नहीं जा सकती कि किमची बनाने का तरीका किसी भी मिलते-जुलते चीनी-जापानी अचार-चटनी से अलग है। हालांकि यह बात माननी पड़ेगी कि किमची पर विदेशी प्रभाव भी झलकता है। मसलन लाल मिर्च का समावेश 15वीं-16वीं सदी में पुर्तगालियों के संपर्क में आने के बाद ही हुआ। आज यह इसका अभिन्न अंग है।
कोरिया के कुछ हिस्सों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और जब कोई ताजी सब्जी सुलभ न हो, तब भोजन को तृप्तिदायक तथा पौष्टिक बनाने के लिए संस्करण से संरक्षित पदार्थों की जरूरत पड़ती है। इसी कारण चटनी या अचार की कोटि की किमची मुख्य व्यंजन बन जाती है। इसे छोटी-सी तश्तरी में मुख्य भोजन परोसने के पहले मेज पर रख दिया जाता है, पर खाने वाले चॉपस्टिक से उठा-उठाकर इसे सलाद नहीं, सब्जी की तरह ही खाते हैं। नूडल हो या चावल के साथ कोई ठंडा-गरम व्यंजन, किमची उसका मजा दोगुना कर देती है। इतिहासकारों की राय है कि किमची की इजाद किसी बौद्ध मठ में की गई, जहां इस ‘सात्विक’ व्यंजन की जुगलबंदी उबले चावलों के साथ साधी जाती थी।
आज कोरिया में सैकड़ों तरह की किमची मिलती है और यह अनुमान लगाया जा चुका है कि कोरियाई प्रतिदिन औसत 20 ग्राम से 200 ग्राम किमची खा और पचा लेता है। किमची का कुटीर उद्योग में वार्षिक उत्पादन कई लाख टन है। दिलचस्प बात यह है कि जब कुछ साल पहले जापान ने किमची का बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन आरंभ किया, तब दोनों ही कोरियाओं ने इसका विरोध किया। अंततः जापान ने यह प्रयास छोड़ दिया। आज यूनेस्को ने मानव सभ्यता की साझे की विरासत सूची में किमची को शामिल कर लिया है और यह कोरिया के ही खाते में दर्ज है।
कोरिया वालों का विश्वास है कि किमची शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाकर अनेक संक्रामक रोगों से बचाता है। कुछ समय पहले जब पूर्वेशिया में ‘सार्स’ नामक महामारी का संक्रमण दहशत फैला रहा था। किमची की बिक्री और खपत कई गुना बढ़ गई थी। अमेरिका के फास्ट फूड विक्रेताओं को किमची अपने पेट पर लात लगती है, जो उनके पारंपरिक रेलिश- डिल पिकल को पछाड़ती नजर आ रही है। वह इस दुष्प्रचार अभियान में व्यस्त रहे हैं कि किमची खाने से पेट के कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। किमची का सबसे बड़ा सुख यह है कि इसे आप घर पर आसानी से बनाकर इसका पूरा आनंद ले सकते हैं।