शरीर की भांति भोज्य पदार्थ भी पंचतत्वों से बने होते हैं और हमारे शरीर को ये पांचों तत्व प्रदान करते हैं। हमारे भोज्य पदार्थ में पंच तत्वों के संतुलन से हमारी तीनों प्रमुख दोष वात्, पित्त और कफ में संतुलन आता है, जिससे हमारा स्वास्थ्य अच्छा बनता है और दीर्घायुष प्राप्त होती है। इन त्रिदोषों में आए साधारण से असंतुलन को अपनी भोजन-व्यवस्था में परिवर्तन द्वारा सुधारा जा सकता है, यदि हमें आयुर्वेदिक भोजन संस्कृति का सही ज्ञान हो।
भोज्य पदार्थों में विद्यमान पांचों तत्व विभिन्न प्रकार के स्वादों के रूप में पहचाने जा सकते हैं। कुल मिलाकर छह स्वाद या रस हैं। रस का शाब्दिक अर्थ है स्वाद। स्वाद-भेद करना हमारी जिह्वा का कार्य होता है। मीठा, खट्टा या कटु स्वाद का हमारे शरीर पर प्रभाव पड़ता है, अतः इन्हें रस कहा जाता है। जिस प्रकार हमारी नेत्रेन्द्रिय रंगों का विभेद करती है और घटनाओं की दृष्टा होती है, जो हममें भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, उसी प्रकार जिह्वा हमें स्वाद की सूचना देती है। किंतु वह स्वाद-विशेष हमारी शारीरिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। आयुर्वेद में छह रसों का वर्णन किया गया है-मीठा, खट्टा, नमकीन, कडुवा, तीखा और कषाय। आधुनिक जीव विज्ञान में केवल चार रसों को मान्यता दी जाती है।