दूध के जल वाले अंश को अलग कर मात्र वसा और ठोस प्रोटीन वाले अंश को ही मक्खन का नाम दिया जा सकता है। जो बचता है वह छाछ है। भले ही यह तंज कसा जाता है ‘माखन तो संत निबटा देते हैं, भक्तों के लिए छूटती है छाछ’ पर यह अपने आप में काफी गुणों से संपन्न रहती है। बॉडी बिल्डर्स नियमित रूप से ‘व्हे’ प्रोटीन का उपयोग करते हैं। कुछ लोग मक्खन से इसलिए कतराते हैं कि कहीं कोलेस्ट्रॉल न बढ़ जाए। परंतु जानकारों का मत है कि कई रिफाइंड तेलों की तुलना में सीमित मात्रा में मक्खन का उपयोग निरापद है।
वैसे मक्खन कोको से भी प्राप्त होता है तथा बादाम और अखरोट के गूदों से भी। जो लोग ‘वीगन’ हैं अर्थात पशुजनित पदार्थ नहीं खाते-पीते, वह इन्हीं मक्खनों का प्रयोग करते हैं। एवोकाडो और नाशपाती जैसे फल को मक्खन फल इसलिए कहते हैं कि उसके गूदे में भी सेहत के लिए फायदेमंद वसा होती है, जो बिल्कुल मक्खन जैसे लगती है।
भारत में ‘नवनीत’ यानी मक्खन बिना दही को मथकर निकाला जाता रहा है- विदेशों में इसे मलाई से अलग कर बनाते हैं। उत्तराखंड के गांवों में आज भी यह ‘नौणी’ की शक्ल में कहीं-कहीं मिल जाता है। पंजाब के गांवों का सफेद मक्खन इसी का सहोदर है, जिसका आनंद पराठे के साथ लिया जाता है।
केक-पेस्ट्री आदि के लिए जिस सफेद मक्खन को काम में लाते हैं, वह नमकीन नहीं, फीका होता है। वास्तव में मक्खन को आकर्षक बनाने के लिए उसमें रंग मिलाया जाता है। कभी-कभार मक्खन में लहसुन या काली मिर्च का पुट भी डाला जाता है। पश्चिमी रसोई में मक्खन का उपयोग कुछ गरिष्ठ सॉस निर्माण में होता है या उबली भाप से पकाई सब्जियों में ऊपर से पिघलाकर।
पॉपकॉर्न तथा मकई के उबले दानों की कल्पना मक्खन के बिना नहीं की जा सकती। ऐस्पैरागस जैसी नाजुक सब्जियों को सिर्फ जरा से मक्खन में ही बहुत हल्का तलकर पेश किया जाता है। मक्खन पर्याय है रेशम जैसी चिकनाहट का जिसका स्पर्श सुख अनिर्वचनीय है। दाल मखनी अपने नाम से ही इसका संकेत देती है। मक्खन गाय तथा भैंस के दूध से ही नहीं बकरी, याक, ऊंट आदि के दूध से भी तैयार होता है। कुछ जर्मन तथा फ्रांसीसी मक्खन इतने नायाब समझे जाते हैं कि उनके नाम के साथ भौगोलिक ‘जन्म स्थान’ का विशेषण (जियोग्राफिकल इंडिकेटर) जोड़ना कानूनन अनिवार्य है।