भोजन बनाने की आयुर्वेदिक पद्धति भारतीय जीवन में हजारों वर्षों से प्रयोग की जाती रही है और हर औसत घर में इस व्यावहारिक ज्ञान का सरल सहज ढंग से उपयोग होता आ रहा है। इस सरल विचार बुद्धि के अनुसार खाद्य पदार्थ सर्द प्रकृति के होते हैं या गर्म प्रकृति के। गर्म प्रकृति के पदार्थों से पित्त की वृद्धि होती है और सर्द प्रकृति के पदार्थों से वात् या कफ की या दोनों की ही वृद्धि होती है। इसके विपरीत कुछ भोज्य पदार्थ ऐसे होते हैं, जिनसे त्रिदोष ऊर्जाओं में संतुलन स्थापित होता है। इन्हें खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है। इसके विपरीत कुछ भोज्य पदार्थ ऐसे होते हैं जो पाचन में भारी होते हैं।
बीमारी के दौरान तथा बीमारी के बाद संतुलित भोजन करना प्रायः जरूरी होता है, क्योंकि व्यक्ति कमजोरी और थकान से पीड़ित होता है। भारी भोज्य पदार्थों को विशेष मसालों तथा अन्य साधनों से संतुलित बनाए बिना ग्रहण नहीं करना चाहिए। ऐसे पदार्थों को अधिक मात्रा में भी नहीं खाना चाहिए। संतुलित भोजन सभी प्रकृति के लोगों के लिए ठीक रहता है और शरीर के साधारण से असंतुलन को भी ठीक कर लेता है। यदि असंतुलन अधिक हो तो भोजन पकाने मे परिवर्तन लाकर ठीक किया जा सकता है। प्रयास रहना चाहिए कि संतुलित भोजन ही पकाया जाए। व्यक्तियों की भी सर्द-गर्म प्रकृति होती है। सर्द प्रकृति वात् या कफ प्रधान होती है तथा गर्म प्रकृति पित्त प्रधान। वात् की स्थिति शुष्क सर्दी की तथा कफ की तरल सर्दी की होती है।