अक्सर लंबे सफर पर रहना क्या आपकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है? क्या आप देर तक हवाई जहाज या ट्रेन की सीट पर बैठे रहते हैं? ज्यादातर लोग सफर के बीच में सीट से उठना बिलकुल जरूरी नहीं समझते। जबकि यह गलत है।
लंबी यात्रा के दौरान घंटों सीट से चिपके रहने से पैरों की नसों में खून के थक्के जमने लगते हैं, जो खतरनाक साबित हो सकता है। थक्के जमने की समस्या को डीप वेन थ्रोम्बोसिस (डीवीटी) यानी नस की गहराई में थक्का जमना कहते हैं।
पैर या जांघ के ऊपरी भाग में यह समस्या अधिक होती है। इसमें पैरों में एक जगह खून जम जाता है और प्लैटलेट्स आपस में चिपक जाते हैं, जिससे खून का थक्का जम जाता है।
लंबे समय तक कुर्सी से चिपके रहने के बाद उठने पर खून के थक्के खून के प्रवाह में बहकर फेफड़ों तक पहुंचते हैं, जहां ये पल्मोनरी इम्बोलिज्म का रूप ले लेते हैं।
पल्मोनरी इम्बोलिज्म फेफड़े की मुख्य धमनी या उसकी किसी शाखा का ब्लॉकेज है, जो खून में अन्य हिस्से से आए पदार्थ से होता है। इससे फेफड़ों में खून का प्रवाह या ऑक्सीजन का प्रवाह रुक सकता है और दिल का दौरा भी पड़ सकता है। 2007 में जारी ‘ग्लोबल हजार्ड्स ऑफ ट्रैवल’ पर डब्ल्यूएचओ के शोध में पाया गया है कि चार घंटे या अधिक सफर करने से थक्का जमने का खतरा दोगुना हो जाता है।
क्या हैं लक्षण
डीवीटी के मुख्य लक्षणों में प्रभावित भाग में दर्द, कमजोरी और सूजन होना शामिल है। समय पर इसके बारे में पता चल जाए, तो उपचार संभव है, अन्यथा ‘थ्रोम्बोइम्बोलिज्म’ हो सकता है, जो जानलेवा है। इसलिए सतर्कता, रोकथाम और जागरूकता जरूरी है। पल्मोनरी इम्बोलिज्म में छाती में दर्द और सांस की तकलीफ होती है।
रोकथाम के उपाय
यह सभी को पता है कि काफ मसल्स को गतिशील रखने से खून का प्रवाह बढ़ता है। इसलिए यदि आप लंबा सफर करते समये एड़ी के जोड़ों के बल पर पैरों को ऊपर-नीचे करते रहें। इससे खून का प्रवाह बढ़ता है और खून का ठहराव नहीं होता है।
हर 30 मिनट पर सीट से उठकर अवश्य टहलें। यदि कार से कहीं लंबे सफर पर जा रहे हैं, तो बीच-बीच में रुककर टहल लें। पैरों और शरीर को नियमित गतिशील बनाए रखने के अलावा शरीर में उचित मात्रा में पानी का होना भी जरूरी है। इसलिए सफर के दौरान भरपूर पानी पीना चाहिए। दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों को लंबे सफर पर जाने से पहले चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। छाती में दर्द और सांस लेने में तकलीफ हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ऐसे कराएं जांच
स्वास्थ्य रिकॉर्ड के अलावा, इसके लक्षणों के बारे में भी डॉक्टर पूछ सकते हैं। डीवीटी के लक्षण अन्य बीमारियों से मेल खाते हैं, इसलिए सही डायग्नोसिस के लिए अल्ट्रासाउंड, कलर डॉपलर और डी-डायमर टेस्ट किया जाना जरूरी है।
इलाज यहां है
खून के थक्के न बनें, इसके लिए डॉक्टर दवाइयों से इलाज करते हैं। कई दफा सर्जरी की भी आवश्यकता पड़ती है। इलाज का निर्णय डॉक्टर रोगी से बात करके और उसके लक्षणों को देखकर ही करते हैं। वैसे, कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स और कम्प्रेशन थेरेपी द्वारा इनका इलाज किया जाता है।
डीवीटी की जांच अल्ट्रासाउंड से की जाती है। पैर का कलर डॉपलर टेस्ट भी कराया जाता है। खून के थक्कों का पता लगाने के लिए डी-डायमर टेस्ट किया जाता है। इसके इलाज के लिए लंबी सर्जरी के समय कम्प्रेशन पम्प लगाया जाता है। इलाज का एक हिस्सा दवाइयां भी हैं।
यदि किसी व्यक्ति को डीवीटी होने का संदेह भी होता है, तो लो मॉलिक्यूलर वेट हेपरिन नामक दवा शुरू की जाती है। थ्रोम्बोलेस्टिक थेरेपी भी कई दफा की जाती है। खून के थक्के फेफड़ों में न चले जाएं, इसके बचाव के लिए फेफड़ों के भीतर आईवीसी फिल्टर लगाया जाता है। डीवीटी से बचाव के हेतु कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स का प्रयोग किया जाता है। साथ ही खून को पतला करने की दवा भी दी जाती है।